आशिक़ मिज़ाज़
नमस्कार👌 जोहार🙏 खम्मागन्नी सा🙏 आज मैं आप सभी के सामने इश्क की वो दास्तान लेकर आई हूं जो पहली मुलाकात से शुरू होती है।और दरीचे के दरारों से झांकती यादों पे खत्म होती है।आशा करती हूं कि आपकी कसौटी पे मेरी रचना खरी उतरेगी। *आशिक मिज़ाज़* पहली मुलाक़ात में हम आशिक मिज़ाज़ हो गए भरी महफिलों में प्यार के नग़मे सुनाने लगे । अजीब सय है ये आशिक़ी,मेरी बेकरारी तेरी बेख्याली, मैं दीवानगी की हद पार करने लगा और तू मुस्कराने लगी । बड़ा दिलकश है इश्क़ का फ़साना हमारा, मुहब्बत जताते रहे नज़रों से, शब्द मौन रहे। मैं तो सीधा-साधा सा बेगुनाह राही था मंजिलों का, तेरी कातिल नज़रों ने ही बनाया जख़्मी-दिल शायर मुझे । कभी तेरी जुल्फों का गुलाब खिड़की से खुश्बू बिखेरता था फ़िज़ाओं में, अब तेरे बन्द दरीचों के दरारों से यादें झांक जाती हैं । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 15/7/2020