आज के बदलते परिवेश में जो रिश्तों के मायने रह गए हैं।उन्हें मैं अपने शब्द तूलिका से ढालने के प्रयास की हूं।🙏 आशा करती हूं कि आपसभी को पसंद आएगी। "क्या खूब कहा है" गुलजार साहब ने भी क्या खूब कहा है- "हंसते रहोगे तो दुनिया साथ है वरना आंसुओं को तो जगह आंखों में भी नहीं मिलती।" दीवाने सभी हैं सफ़लतायों के गर्दिशों के तो सिर्फ मज़ाक उड़ाया करते हैं साथी हैं सभी खुशियों के गमों को तो सिर्फ दोस्त बांटा करते हैं। पर सुना है आजकल दोस्ती के भी मायने बदल गए हैं बदलते दौर में पैमाने बदल गए हैं हितैषी कम,उसके वेश में दुश्मन ज्यादा हो गए हैं, भौतिकता के इस दौर में निश्छलता, निश्वार्थ भावना कहीं खो सी गयी है। आधुनिकता के इस चलन में दुनिया की संगत ही बदल गयी है दोस्ती, और रिश्तों मे भी अब मतलबपरस्ती का डेरा है। जिधर देखो उधर ही अराजकता का बोलबाला है, संबंध हुए तार-तार, पैसों की तराज़ू पे बिक रहा ईमान, स्वाभिमान। गुलज़ार साहब ने भी क्या खूब कहा है। "आँसुयों को जगह तो आंखों में भी नही मिलती।' श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 25/6/2020 ...