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काश कोई लौटा दो

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 *काश कोई लौटा दो* इन दवाओं की शुक्रगुजार हूं मै,क्योंकि इन्हें खाते ही हो जाती हैं पलकें बोझिल और नींद अपनी आगोश में ले लेती है आज की रात क़यामत की रात थी और आज का दिन काला दिन था,जो  लूट ले गया मेरी दुनिया,और मै बेखबर रही मां की ममता चीत्कार कर रही थी मौत को भी मानने से इनकार कर रही दिल दर्द से इतना जल रहा था  कि आंसू सुख गए,बहना भूल गए सिर्फ चेहरे पे चीत्कार थी,पुकार थी हर किसी से गुहार कर रही थी ये माँ कोई तो लौटा दो मेरी खुशियां कैसे जियूँ तेरे बिना  काश कोई लौटा दो मेरी खुशियां अब ये दर्द साल-दर-साल हो गया ना कोई चमत्कार,ना ही कोई उपकार हुआ मेरा दर्द अंतहीन बन गया आह काश कोई लौटा दो मेरा दिल का टुकड़ा ज़िन्दगी भर चाकरी करूँ तेरी,काश.… लोगों की तरस,सांत्वना नही चाहिए मुझे मेरा ज़िगर का टुकड़ा चाहिए मुझे काश कोई लौट दो.... एक अंतहीन इंतज़ार में बंधी ये माँ ओ अब लौट कर नही आएगी पर दिल ये मानने को तैयार नही हज़ारों भुलावे दिए दिल को पर हरबार इंतज़ार के खोज लेती है बहाने काश कोई लौटा दो..... अब दर्द ही हमदर्द बन गया है यही साथी,यही सम्बल बन गया है काश कोई लौट दो.... श्रीमती...

इंतज़ार अधूरे रहते हैं

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 #इंतज़ार अधूरे रहते हैं# किसी ने बहुत सही कहा है -- "इंतज़ार वहीं अधूरे रह जाते हैं  जहां इंतज़ार शिद्दत से किये जाते हैं।" हमारे ख़्वाबों का घरौंदा भी उस वक्त गिरा जब तूफ़ां थम गई थी,खुशियों का बसेरा था कातिल हवाएं शांत थी,और हंसी की  गुनगुनी धूप खिली थी इन यादों के जहां का क्या करूँ अश्क़ बन गालों पे ढुलक जाते हैं आंखें बंद करूँ तो बस तुम ही दिखते हो  खुशियों का इंतज़ार,अब तूफानों में खो गया है दिल मानने को तैयार नहीं कि  मेरी धड़कनों की मंजिल बदल गयी  तुमसे ही मेरी सारी खुशियाँ थी सतरंगी अब उदासियों के बवंडर का बसेरा है  श्रीमती मुक्ता सिंह रंकराज 23/10/21

कब आओगी बेटा

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 "मेरी प्रिंसेस" क्या लिखूं ये मेरे धड़कनों की मंजिल शब्द ही नही मिलते,भावाभिव्यक्ति को जो तू थी तो फिजायें भी गुनगुनाती थी हरक्षण बहारों की झोको सी थी तेरी खनकती हंसी बातों की खुशबुयों से सराबोर करती थी हमारा जहां तेरे कौशल के दर्प से दमकता था हमारा आभा हर ओर बिखरी रहती थी खुशियां-ही-खुशियां मारकेश का लगा ऐसा नज़र,अब बिखरी है उदासियां राहु सच मे ग्रहण लगा गया मेरे चांद को,अंधेरा हो गया हमारा जहां अब भी लगता है,कहीं से आ गले लग जाओगी और धीरे से मेरे गालों को चुम वो अव्यक्त प्यार जताओगी कान तरसते हैं तेरी आवाज़ सुनने को "अरे यार मम्मी सुनो ना" आंखे तेरी छवि बसाए,ढूंढती हैं तुझे टकटकी लगाए कब आओगी बेटा, अब बस बहुत हुआ  आ जाओ,बहुत दिन हुए,तुझे नज़रों से ओझल हुए तेरी आस में आंखे समंदर बन तांडव करती है हरपल आस की लहरें उठतीं हैं तूफान बन प्रतिपल  और निराशा के पत्थरों पे दम तोड़तीं हैं तड़प-तड़प हरपल गमों के अंधेरों में अब धुंधला-धुंधला सा दिखता है जहाँ श्रीमती मुक्ता सिंह रंकराज 26/9/21

बड़े अरमानों से

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   कुछ सपने जब बिखरते हैं यूं तो हाल बड़ा बुरा होता है।पर हर टूटने में ही हिम्मत भी होती है।बस ढूंढने की जरूरत है।       #बड़े अरमानों से#     बड़े अरमानों से आए थे तेरे कुच्चे में खुद तो आए थे ही दोस्तों को भी ले आए थे तेरे दर पे। अरमानों की महफिलें सजी थी तेरी गलियों में और खुशियों के फव्वारे उठ रहे थे तेरे देहरियों पे। सखियों से घिरी छुई मुई सी चल रही थी तुम ऎसे जैसे सितारों के तार सी छेड़ रही हो दिल के तमन्नाओं को। बड़ी मुश्किल से संभाला था मैंने दिल को जो बल्लियों उछल उछल बता रहा था हाले ए दिल सभी को। सारी रस्में भी हो रही थी,साथ मैं भी हो रहा था तेरा सात फेरों में सपने भी हजारों बुने थे मैंने उस हवन कुंड की अग्नियों से। और तुम्हे अपने सपनों की मल्लिका बना चला था नई दुनिया बसाने पर मै था हकीकत से दूर सुहाने सपनों के बुने अपने ही जाल में। सारी रस्में भी बनी थी गवाह हमारे गठबंधन की पर तूने एक लम्हे में मेरे दिल के अरमानों को इस कदर तोड़ा कि यमराज भी मुरीद हो गए तेरे इस अनदेखी कत्ल ए आम से। टूटे दिल को लिए फिर रहा हूं आज मार...