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यादों की महफ़िल

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 #यादों की महफ़िल# रात के नीरव में यादों की महफ़िल सजती हैं इन खामोशियों के जंगल मे तेरी हंसी गूंजती हैं मन उदास है मेरा,ये बीते लम्हों जरा बहला दो महबूब मेरे अब किसी की ज़िंदगी बन गए हैं जरा ये हवा उसे छू कर आ,और मुझे सराबोर कर बेवफ़ा कैसे कहूं ,वक़्त ने जुदा किया हमको बेकरार सिर्फ मैं ही नही,तुम भी बेचैन होते थे गवाह है वो बीते लम्हें,जो गुजारे साथ हमने अफसोस है,प्यार का इज़हार ना कर सके हम फिर भी शिकायत नही रब से,क्योंकि  महबूब मेरा खुश है,अपने नए जहां में ये अलग बात है कि हम खामोश तड़पते हैं  उनकी यादों की बरात सजा कर तन्हाइयों में श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 17/6/21

तस्वीर

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 नमस्कार🙏जोहार🙏खम्मागन्नी सा🙏।आज हमारे एक परिचित ने हमारी शादी के कुछ महीने बाद कि एक तस्वीर हमें भेजी।जिससे काफी यादें जुड़ी हुई थी हमारी।बहुत अच्छा लगा।उसी पे मेरी ये रचना है।आशा है कि आपको भी पसंद आएगी। *तस्वीर * आज किसी ने भेजी है हमारी यादों की तस्वीर पुरानी बन्द पड़े थे जो जज्बात अल्बम के पन्नों में आज किसी ने वो अहसास भेजा है। जिंदगी के उधेड़-बुन में खो गए थे वो सुनहरे लम्हें कहीं आज किसी ने वो अनमोल लम्हात भेजा है। क्या दिन थे वो भी  अनजाने राह के हमराही थे हम कुछ उन्हें समझना था,कुछ हमें समझना था आज किसी ने वो शुरुआत भेजा है आज को समझने-समझाने में  कब बीत गया वो सुनहरा कल कल की चिंता में बिखर गए वो पल आज किसी ने वो पलों का सौगात भेजा है। समय बदला,लोग बदले,रिश्ते बदले बागों में प्यार के फूल भी खिले कुछ तुम बदले,कुछ हम बदले पर बदला नही हमारा विश्वास आज किसी ने वो,विश्वास की शुरुआत भेजा है। ये तस्वीरें थी तो मेरे पास भी बन्द अल्बम के पन्नो में इंतज़ार करती कभी फुर्सत नही मिली, तो कभी बन्धनों को निभाते रहे आज किसी ने इंतज़ार की वो याद भेजा है। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकार...

मुस्कराहट

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 मुस्कराहट नमस्कार🙏जोहार🙏खम्मागण्णी सा🙏आज मैं एक आशिक के चेहरे की मुस्कराहट के राज़ को कलमबद्ध करने की कोशिश की हूं।और आशा करती हूं कि आपको पसंद आएगी।            #मुस्कराहट# तेरे चेहरे पे मुस्कराहट के राज बड़े गहरे हैं दिल मे उठा है तूफ़ां जिसका,उसका दिल पे राज बड़े गहरे हैं फ़िज़ायों में जब भी गूंजता है उसका नाम भूले से  तेरे चेहरे की मासूमियत उसके रंगों में ढल जाती है लाख छुपा ले तू अपनी घबराहट को ठहाकों में तेरे चेहरे का सुर्ख रंग उसके रंगों में ढल जाती है बातों में बेचैनियां,दिल की धड़कन आवाजों में थर्राती है नज़रें झुकाए सबसे वो एक पल कई सपनो में ढल जाती है बड़े खुशनशीब है महबूब तेरे,जो तू उन्हें इतनी मुहब्बत करता है और तेरा इश्क़ इंतजार में भी उनका प्यार ढूंढ लेता है। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 5/10/20

सदियों का इंतज़ार

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 आज मैंने अपने ब्लॉग को एक पत्नी के इंतज़ार की मनोदशा को समर्पित किया है।जो कोई भी हो सकती है।एक सोल्जर कि पत्नी, एक विदेश में बसे की देश में इंतज़ार करती पत्नी, एक प्रवासी की पत्नी जिसका पति कई महीनों बाद घर लौट रहा हो।या वो जो पति - पत्नी दोनों रोजी रोटी के लिए अलग अलग शहर में रह रहे हों, कई दिनों बाद, कई महीनों बाद पति घर आ रहा हो।आशा है कि मै एक पत्नी की उस इंतज़ार की मनोदशा को चित्रित करने में खरी उतरी होऊं आप सभी के सामने।🙏      *सदियों का इंतज़ार" सदियों का इंतजार जब एक दिन में बदल जाता है, तो सदियां छोटी और एक दिन बड़ा हो जाता है, दिल की धड़कने तेज यूं हो जाती हैं, कि हरेक आहट पे नज़रें बस देहरी निहारती है , और लगता है जैसे ख्वाबों पे भी इंतज़ार का पहरा है एक खटके पे दिल बल्लियों उछल जाता है। सदियों का इंतजार जब एक दिन में बदल जाता है, तो सदियां छोटी और एक दिन बड़ा हो जाता है, सदियां तो काट ली मैंने दिन गिन - गिन कर, पर अब एक दिन पे, एक पल भी भारी हैं, काश कि तुम ये संदेशा ना भेजे होते, कि मै कल आ जाऊंगा सांझ ढलते - ढलते। सदियों का इंतजा...

दसकों का फासला

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    *दसकों का फासला* दसकों का है कुछ यूं फासला एक प्यार वो था जो नज़रों से हो जाता था एक प्यार ये है जो तोहफों के लिए टूट जाता है। पहले तो जुबान ना बोलती थी कुछ नज़रें बयां कर जाती थी दिल का हाल आज मोबाइल पे बातें करते है सारी रात फिर भी दिलफेंक आशिक़ ही मिलते हैं हरबार। दसकों का है कुछ यूं फासला वो इंतजार का हर लम्हा कटता था गिन गिन आज तो विडियो कॉल दे जाती है खबर हर पल की प्रेमी एक दूजे के संग बैठने से भी कतराते थे जमाने से आज तो पकड़े जाने पे कह देते है प्रोजेक्ट बना रहे थे। पर हर आशिक़ के लिए नहीं है ये व्याख्या कहा जाता है ना कि जो के साथ घुन भी पीस जाता है एक सड़ी मछली पूरा तालाब गंदा कर जाता है। इंटरनेट ने फैलाया येसा माया कि बच्चो के साथ बूढ़े भी हो रहे छिछोरे अपने को कह रहे जवान, जवान को बना रहे बूढ़े। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 30/5/2020

मन का दर्पण

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      *मन का  दर्पण* देखो, मन का दर्पण क्या क्या दिखलाती है हमारे व्यक्तित्व के हर वो पल बताती है जो हम सब से हैं कुछ छुपाते कुछ दिखाते जहां कुछ अपने दिखे,जो हैं चेहरे पे कई चेहरे लगाए कुछ शुभचिंतकों के, जो हर वक्त हैं संग मेरे। मै बैठा था यूंही अनमना सा, कुछ उदास सा हिसाब किताब कर रहा था अपने अहसास का रिश्तों की मर्यादाओं का, उनकी तल्खियों का जमाने की ऊंची नीची, बड़ी छोटी नीतियों का अपने अहंकार का, अपने स्वाभिमान का तभी अंदर से आवाज आई कहां भटक रहे हो देखो,मन का दर्पण, तब करो हिसाब किताब। अपनों के चेहरे झांक रहे थे, उस दर्पण में लुक छुप के कुछ धुंधले से कुछ ऊर्जा से चारों ओर उजाले लिए कुछ मेरी भी थी, मन की भावनाएं छुपे से क्रंदन करते कुछ अभिलाषाएं जिम्मेवारियों का घूंघट ओढ़े आज रूबरू हो रहे थे, जैसे हम अपने आप से । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 26/5/2020      *दूर ले जाएगी* दूर ले जाएगी हमको तुझे भूलने की जिद हमारी आज अकेला बैठा हूं इस सफर में तन्हाइयों को साथ ले जाने की जिद में और मुस्करा देता हूं ये सोचकर कि साथ में...

तस्वीर

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    *तस्वीर* आज नज़रों से ये तस्वीर गुजरी लगा जैसे कल की ही बात हो कल तुम मेरे पास थे जितने आज दूर हो उतने वो लम्हा बीता दिन बीते महीने और साल बीते हर साल आती है ये पूजा अपने नियत तिथि पे पर वो लम्हा हुआ दुर्लभ अब इन तीन सालों में कभी कर्तव्य बोध कभी जिम्मेवारियों का बंधन बनी दीवारें बड़े निष्ठुर हो गए हो तुम अपनी कार्य  -शीलता में तुम क्या जानो मेरे लिए कितने मायने रखते हैं ये लम्हे कभी तुम मेरी कोमल भावनाओं को स्पर्श तो करो पर मै भी ढूंढ़ लेती हूं अपने मर्ज की दवा जो तुझसे जुड़ी हो कर लिया मैंने भी ऑनलाइन तेरी पूजा दिल को तसल्ली दी पर तेरा आशीर्वाद का वो स्पर्श ना मिला ये इक्कीसवीं सती में कहां है वो नब्बे के दशक की अनुभूतियां आज नज़रों से एक तस्वीर गुजरी है और दे गई कितनी सारी यादों की सौगातें। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 25/5/2020

तुमको देखे हुए

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    *तुमको देखे हुए* तुमको देखे हुए जमाने बीत गए पर लगता है जैसे आज की ही बात हो और पलकें बन्द कर तेरा अक्स देख लेता हूं। तुमको देखे हुए जमाने बीत गए पर आज भी जब उन गलियों से गुजरता हूं वहां की हवाओं में बिखरी तेरी खुशबू समेट लेता हूं। तुमको देखे हुए जमाने बीत गए पर आज भी उन फिजाओं में तेरे कहकशे गूंजते हैं और मैं उन कहकशों में तेरी शिकायतें सुन लेता हूं। तुमको देखे जमाने बीत गए पर आज भी जब गुजरता हूं तेरी गलियों से तुझे देखने की चाह में ठिठक सा जाता हूं पर अब उन गलियों में ना तो कोई अधखुली सी खिड़कियां है ना ही सहेलियों से गप्पे लड़ाती गुजरती हुई तेरी तिरछी निगाहें। और मैं इन गलियों से घायल दिल समेट लाता हूं । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 23/5/2020      *कुछ qoutes*        *छुप नहीं सकते तुम* छुप नहीं सकते तुम चाहे लाख डाल लो परदे मै वो हवा का झोंका हूं तुम्हे हौले से छू जाता हूं।        *ये ठंडी हवा का झोंका* ये ठंडी हवा का झोंका जैसे तेरा पैग़ाम लाया हो तुझे छू कर तेरी खुशबू को...

मालूम नहीं था

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           *मालूम नहीं था* मालूम नहीं था कि तुम यूं मिलोगी एक दिन नज़रें मिलते ही इश्क हो जाएगा तुमसे वो सुर्ख गुलाबी तेरे अक्स आज भी छेड़ते हैं उसपे तेरी वो चुपके से नज़रे मिला झुकाना आज भी चेहरे पे मुस्कान ले आते हैं मेरे । मालूम नहीं था कि ये दिन भी आएगा तुम हमे यूं इश्क के समंदर में छोड़ जाओगे मेरे इश्क के कब्र पे हसीन दुनिया बसाओगे अब इस घायल आशिक़ की यही है दुआ तुम खुश रहो अपने जन्नते जहां में। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 17/5/2020

बच्चे बिन

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"बच्चे बिन" हमारी बगिया है यही , तुम ऊर्जा के शक्ति पुंज हो मेरे, तुम बच्चे ही मेरी दुनिया हो, बात-बात में तुनकमिजाजी, तुम्हारी वो प्यार भरी शरारतें, और मै रूठ जाती तो तुम्हारा मनाना, यही तो है मेरी प्यारी ज़िन्दगी, अगर तुम न होते तो कैसी होती ज़िन्दगी, घर में होती वीरानी और सन्नाटा, शायद मैं न जी पाती तुमलोग बिन। .....श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 16/3/19