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मेरे पापा

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आज पापा जी आपकी बहुत याद आ रही है।आंखों से अश्रु की अविरल धारा रुकने से इनकार कर रही है।शायद उसे भी मेरे मनोभावों का पता है।तभी तो वह अडिग हो साथ दे रही है।आपका वो दुलार, प्यार और जादूगरी बहुत याद आ रही है।                   *मेरे पापा* क्यों छोड़ गए मुझे मझधार में इस मतलबी दुनिया के बीच अकेला आप तो जानते थे मैं घुट-घुट कर जिऊंगी आपके बिना, क्योंकि बिन नीव इमारतें गिर जाती हैं। न जाने कौन सा जादू जानते थे आप की बिन बोले जान जाते थे मेरी हर बात आप ही तो थे आदर्श मेरे बिन आदर्शों के क्या मूल्य है जीवन का। अजीब सी टेलीपैथी थी हमारी मैं याद करती और आप बिना संदेश आ जाते थे प्यार के दो मीठे बोल में अमृत घोल पिला जाते थे। फिर क्या हुआ ऐसा जो रूठ गए मुझसे बिन बोले, बिन पते के देश चले गए अब तो हर पता एक क्लिक पे खुल जाता है तो आप बिन पते के देश क्यों चले गए। अब कैसे बतायूँ हाल अपने दिल का अब तो टेलीपैथी भी काम नही करती अब कैसे बुलायूँ आपको कि एक बार फिर से आ जाइए पापा सीने से लगा मुझे, दुनिया से छुपा लीजिये सर पे, फिर से...

थोड़े से सुख के लिए

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   *थोड़े से सुख के लिए* थोड़े से सुख के लिए क्या पाया, क्या गंवाया आज देख लो सड़कों को नापते इन लड़खड़ाते नंगे पैरों को जीवन की आस में मौत की ओर बढ़ते इस रेले को। थोड़े से सुख के लिए क्या पाया क्या गंवाया, क्षणिक सुख की मायाजाल में छोड़ आए थे ये रिश्तों की बगिया बड़े - बुजुर्गों की डांट भरी सीख और छोटों की वो अधिकार का लड़कपन बड़ी अच्छी लगती थी ये आधुनिकता सुख की तलाश में खो आए थे शान्ती। थोड़े से सुख के लिए क्या खोया, क्या पाया आज ये अपनी झूठी अभिलाषाओं की, चुका कीमत सोच रहे हैं इस झूठी शान से भली थी वो अमरैया जहां एक आह पे दौड़ पड़ते थे सभी भैया। थोड़े से सुख के लिए क्या खोया, क्या पाया गांव छूटा, छुट्टी वो सोंधी सी खुशबू छुट्टी वो दोस्तों की टोली और ना जाने क्या - क्या छूटा और क्या क्या टूटा इस अंधी दौड़ में। इस महामारी काल में जब आंखे खुली तो लूट चुके थे ये इस क्रूरता के आधुनिक बाज़ार में झूठे सपनों ने भी आंखे फेर ली थी तब याद आया इन्हे अपना वो गांव जहां नमक रोटी भली थी बड़बोले की इस झूठी कमाई से। थोड़े से सुख के लिए क्या खोया, क्य...

समय की रेत

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    *समय की रेत फिसलती हुई* मुट्ठी से समय की रेत फिसलती हुई सी जा रही है जिंदगी को समझते- समझते उम्र निकलती सी जा रही है मंजिले दूर खड़ी मृगमारिचिका सी चिढ़ाती हैं हमें अपनो को सवांरते- संवारते वेगाने से बन बैठे हैं हम दूर कहीं खड़ी कामयाबियों की मंजिलें बुला रही हैं हमें और कर्तव्य पैरों में बेड़ियां डाले मुस्करा रही हो जैसे मैंने भी हंसकर कहा मंजिलों से कर्तव्यों से बड़ी नहीं कामयाबियां रेत पे तो नाम लिख दूं मैं पर समय की आंधी उड़ा ले जाएगी क्यूंकि रेत तो आधीन है उन हवाओं और लहरों की तो क्यूं ना मै समय की रेत को रिश्तों के अहशाशों से भिगो दूं और भीगी हुई रेत को मुट्ठियों में भर जी लूं। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 24/5/2020        *थोड़े से सुख के लिए* थोड़े से सुख के लिए क्या पाया और क्या गंवाया आज देख लो सड़कों को नापते इन लड़खड़ाते नंगे पैरों को जीवन की आस में मौत की तरफ बढ़ते इस रेले को। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 24/5/2020  *आराम करो आराम का दिन है* आज बड़े प्यार से जब तुमने कहा था मुझे आज आराम करो आराम का...

चलो मेरे साथ

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        *चलो मेरे साथ* चलो मेरे साथ कहते थे तुम बड़े गर्व से आज राहें बदल गई तेरी मंजिलों के जो याद थे आज जिंदगी बन गए और जो जिंदगी थे यादों में भी ना रहे। आंखे भी अब पथरा गई अब तेरी बाट जोहते कल्पनाओं का समंदर भी अब सूखने लगा है आस की मंजिलें भी अब बदलने लगी हैं आ जाओ फिर से एक बार सब छोड़ कर फिर से कहो एक बार मुझसे,चलो मेरे साथ। एक बार फिर से समेट लो मुझे तुम अपने हाथो में मेरे लरजते हाथों को थाम लो मेरी कांपती हथेलियों को एक गर्माहट दे दो फिर एक बार कहो चलो मेरे साथ । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 15/5/2020