मेरे पापा
आज पापा जी आपकी बहुत याद आ रही है।आंखों से अश्रु की अविरल धारा रुकने से इनकार कर रही है।शायद उसे भी मेरे मनोभावों का पता है।तभी तो वह अडिग हो साथ दे रही है।आपका वो दुलार, प्यार और जादूगरी बहुत याद आ रही है। *मेरे पापा* क्यों छोड़ गए मुझे मझधार में इस मतलबी दुनिया के बीच अकेला आप तो जानते थे मैं घुट-घुट कर जिऊंगी आपके बिना, क्योंकि बिन नीव इमारतें गिर जाती हैं। न जाने कौन सा जादू जानते थे आप की बिन बोले जान जाते थे मेरी हर बात आप ही तो थे आदर्श मेरे बिन आदर्शों के क्या मूल्य है जीवन का। अजीब सी टेलीपैथी थी हमारी मैं याद करती और आप बिना संदेश आ जाते थे प्यार के दो मीठे बोल में अमृत घोल पिला जाते थे। फिर क्या हुआ ऐसा जो रूठ गए मुझसे बिन बोले, बिन पते के देश चले गए अब तो हर पता एक क्लिक पे खुल जाता है तो आप बिन पते के देश क्यों चले गए। अब कैसे बतायूँ हाल अपने दिल का अब तो टेलीपैथी भी काम नही करती अब कैसे बुलायूँ आपको कि एक बार फिर से आ जाइए पापा सीने से लगा मुझे, दुनिया से छुपा लीजिये सर पे, फिर से...