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ठान लिया मैने

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नमस्कार 🙏जोहर🙏 खम्मागन्नी सा🙏😊 आज मैं बुलंद हौसले पे अपनी स्वरचित रचना प्रस्तुत कर रही हूं।जो कक आत्मविश्वास सड़ लबरेज़ है।हर परिस्थिति सर जूझने को तत्पर है।आशा करती हूँकि आप सभी को पसंद आएगी🙏                "ठान लिया है मैने " ठान लिया है मैने मंजिलों को पाऊंगी एकदिन चुनौतीओं पे है नज़र हमारी बाधाएं भी ना रोक पाएंगी। माना लक्ष्य है दुःस्कर अर्जुन का तीर चलाना होगा मंजिले हैं फूल सी तो  फूल कांटो के बिना कहाँ खिल पाई है ये वक्त तू भी दिखा अपने सितम वर्ना अफसोस करेगा एकदिन क्योंकि सफलता के राही को ठोकरें कहां रोक पाएगी । जानती हूं फ़तह का सफ़र है  पथरीला, उबड़-खाबड़ से भरा पर जफ़र के मुसाफ़िर को ये  आफतों का टीला कहां रोक पाएगी श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 17/7/2020

तेरी चाहत

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       नमस्कार🙏 जोहर🙏 खम्मागन्नी सा☺️🙏 आज का विषय है तेरी चाहत।मुहब्बत का रिश्ता एक पाक साफ रिश्ता होता है।जिसे इबादत की तरह पूजा जाता है।एक महबूब का साथ जन्नत से लगता है।साथ उसको रुषवाईयों से डर भी लगता है।और भलाई चाहने के लिए दो कदम पीछे भी हटने पड़ते है।आशकरती हुन की आपसभी को पसन्द आएगी ये ग़ज़ल🙏                  *तेरी चाहत* तेरी चाहत आजकल मेरी जियारत हो गयी है, तू है अनमोल अहसास मेरा,धड़कनो की इबादत हो गयी है। वी तेरी निश्छल सी हंसी और पीछे से आकर छू लेना, वो अदा,ओ पल मेरे लिए जैसे जन्नत सी हो गयी है। हमारे इश्क के चर्चे अब शामो-सहर आम हो गयी है, हमारी गुफ़्तगू की खबरें अब महफिलों की जान हो गयी है। तेरी मोहब्बत का नशा यूँ है मुझपर,मैं कुछ कहता भी नही , और जमाने में इसकी गहराइयों की खबर-ए-आम हो गयी है। दिल डरता है ज़माने की रुसवाइयोंसे,क्योंकि फरिश्ते सा दिल है तेरा, कहीं मेरी आशिक़ी, जला न दे चिलमन तेरा, ऐ डर सुबह-शाम हो गयी है। तुम तो रब की कबूल दुआ हो मेरी,सादगी पे तेरे दाग ना लगे कभी, ये सोच बढ़ता...

खामोशी

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 आज मैं खामोशी पे एक ग़ज़ल लिखने का प्रयास की हूं।खामोशी की भी एक अलग दुनिया होती है।वो बिना बोले बहुत कुछ नज़रों से बोल जाती है। और खाश कर तब जब मामला इश्क का हो तो।आशा करती हूं कि आपको पसंद आएगी       *खामोशी* खामोशियों में भी एक फ़साना होता है यहां जबां कम नज़रें ज्यादा बोलती हैं। इन सन्नाटों में भी, दिल के कई राज दफन है पर चेहरे पे मासूमियत लिए, नज़रे चुलबुली सी हैं। इन तन्हाइयों की भी,अपनी मशरूफियत है किसी के आने के इंतज्जार से, नज़रों में हलचल सी हैं। सुना है खामोशियों तले, इज़हारे मोहब्बत की दास्तां होती है पर नज़रे हैं शरारती, भरे महफिलों में भी बयां कर देती हैं । वो खामोश हैं, जमाने की रुसवाइयों से भी डरते हैं और इश्क़ परवाने की देखिए गुस्ताखियां, कि जख्मों की गहराइयों से भी,बेपरवाह हो गए हैं। जानना था उन्हें हमारे दिले-हाल,तो कैफ़ियत पूछते हैं और तिरछी नज़रों से,पलके झपका दीवाना बना देते हैं। उनकी ये अदा दिल को चुपके से छू लेती है और ये दिल-ए-खामोशी है कि,तन्हाइयों को चुन लेती है । सोचा खत्म हुई,अब ख़ामोशियों के अफ़साने के किस्से पर उनकी जबां ...

गलतफहमियों का फासला

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 ग़ज़ल लिखने का प्रयास कर रही हूं।उसी कड़ी में ये एक और प्रयास है।और आशा करती हूं कि आप सभी के हौसला अफजाई से एक दिन अच्छा ग़ज़ल लिखने लगुंगी । #ग़ज़ल#         *गलतफहमियों का फासला* हमारे दरमियान ये कैसे फासले हो गए गलतफहमियों का सैलाब येसा उमड़ा कि "हमतुम", "जमीं और आसमां" हो गए । बस तसव्वुर ये दिल है इतनी कि एक दिन कोई बादल बन आएगा और अपनी बूंदों से हमें एक कर जाएगा क्यूंकि सुना है आसमां भी बादलों पे सवार जमीं से मिलने आता है। उस एक क्षण के इंतज़ार में बाट जोहती रही जिंदगी पर अब तो इंतेहां हो गई तेरे वहम की तू ना आया पर आया तेरा फरमान है। लगता है कि अब बरसातें तो आएंगी, पर हमारा दामन सूखा ही रहेगा क्यूंकि हमारे चारो ओर तेरे दगा की दीवारें हैं। बस अब अंजुमन मुक्ता की आरज़ू है इतनी कि दोस्ती में अब कोई वहम ना पाले वर्ना हर दोस्त "जमीं और आसमां" बन जाएंगे खफा की दीवारें होंगी इतनी ऊंची कि "हम - तुम", "मैं और तुम", बन जाएंगे । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 11/6/2020

इश्क साहिल बन गया (ग़ज़ल)

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  आज पहली बार एक *ग़ज़ल* लिखने का प्रयास की हूं।और आशा करती हूं कि आलोगों को पसंद आएगी।जो भी भूल चूक हो माफ़ करेंगे🙏       *इश्क साहिल बन गया* दिल ए दर्द जब हद से गुजरा तो दवा बन गया जिंदगी में तूफ़ान इतने उठे की इश्क साहिल बन गया । मोहब्बत के समंदर में सुना है आजकल तूफ़ान उठा है इश्क की लहरें भी आजकल साहिल से  मिलने आती हैं और आकर साहिल से टकरा कर मायूस लौट जाती हैं। एक वक्त वो था कि इश्क की दर पे हम सजदा किया करते थे और वो बेपरवाही से हमारी हालत पे हमदर्दी जताया करते थे। आज हम इश्क की गलियों से थोड़े निर्मोही क्या हुए कि सुना है हुस्ने वफा इश्क की गलियों में अश्क ए फूल बिखेरते हैं और भूले से अगर कोई हमारा नाम क्या ले लेता है भीगी पलकों से इश्क के रंज ए सफ़र में तन्हाइयों से सर फोड़ लेते है । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 10/6/2020