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आओ मिलकर, कुछ कोट्स

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     *आओ मिलकर" आओ मिलकर एक नया जहां बनाए चारों ओर है स्वार्थ का समंदर इसमें हम निस्वार्थ की चपू चलाए तुम्हारे साथ में सारा जहां है ये दोस्त आओ मिलकर नयी दुनिया बसाएं श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 28/5/2020           "कम से कम* ये मेरे ईश्वर इतनी सी मोहल्लत दे दे कि कम से कम देख सकूं अपनों को कोरोना से तो हमने लड़ लिया हंसते हंसते कम से कम विदा होऊं इस दुनिया से तो आंखों में अपनों की छवि और होठों पे मुस्कान हो श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 28/5/2020       * खालीपन * अपने खालीपन को भरते हैं हम तेरी यादों की तन्हाइयों से और दिल में आस जगाते है हम तेरे वादों के भरोसे पे श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 28/5/2020                 *कांटों की चादर* मैंने हर परेशानी को दोस्त बनाना सीखा है क्यूंकि ये दुनिया बड़ी जालिम है राहों में रोड़े नहीं कांटों की चादर बिछाती है श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 28/5/2020

सोचा तो था, गुमशुदा रास्ते

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    *सोचा तो था* सोचा तो था कि तुमसे मिलकर हम इजहारे- मोहब्बत करेंगे पर तुम्हारे मशरूफ रहने की अदा ने मुझे घायल कर दिया हमे डर है कि तुम्हारी ये अदा कहीं तुम्हे तन्हा ना कर दे क्यूंकि तुमपे तो मसरूफ़ रहने का जैसे जुनून ही सवार है। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 25/5/2020            *गुमशुदा रास्तों पर* मै गुमशुदा रास्तों पर यूं बढ़ता ही जा रहा हूं जैसे खोज रहा हूं अपनी अनमोल ख्वाहिशें जो ना जाने कब से है मुझसे गुमशुदा और खफा जान रहा हूं इन रास्तों की नहीं है मंजिलें पर मेरी ख्वाहिशें दिखा रही हैं मुझे रास्ता । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 25/5/2020

मासूम सवाल

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     *मासूम सवाल* जब भी राजनीती की रोटी सिकती है सड़कों पे, आफत टूटती है सबसे ज्यादा बच्चों पे, बच्चे भूख- प्यास से रहते हैं बेहाल, और विकास की झूठी राजनीती करते हैं नेता, इनसे है मेरा बस एक ही सवाल ? क्या मैदान कम पड़ गए राजनीती के लिए, क्या सड़को पे होगा हंगामा,तभी होगा विकास, इनके पास न है कोई मुद्दा, फिर भी हैं सड़के घेरे। हंगामा करने वालो, एक नज़र तो डालो मासूमों पे, जब आप होंगे रजाइयों में दुबके,ऐसी में बैठे, उस समय ये मासूम निकले होंगे अपनी कर्मभूमि को, शायद नाश्ता भी न किया होगा ढंग से, मन में होगा बस एक ही डर, कहीं छूट न जाये बस, आठ घंटे बाद लौटे हैं ,अपनी खुशियाँ ढूंढने, माँ का आँचल,गर्म खाना, परिवार का प्यार पाने । पर आपको क्या इन सब बातों से, आपको तो करनी है अपनी राजनीती, मासूम रहे परेशान, आपको तो करना है जाम, सड़क पे होगा हंगामा, तभी आपको मिलेगी पहचान। इस ड्यूटी पे लगे प्रशाशन से करो जब सवाल, प्रशाशन मज़बूरी के नाम पे है पल्ला झाड़ती, कहती है हम हैं मजबूर वर्दी पे लगे अशोक स्तम्भ से। नन्ही सी आँखे,मासूम चेहरे पर है एक ही सवाल, क्या है...