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नारी ही हो सकती

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 *एक नारी ही हो सकती* सब्र के नाव पे बैठी हौसलों की पतवार लिए वो और कोई नही एक नारी ही हो सकती हर मुश्किलों से लड़ जाए,छुईमुई सी खो जाए नाज़ुक फूलों की खुशबू सी  कांटों के बीच खुद रह दूसरों को महकाये वो और कोई नही एक नारी ही हो सकती दुनिया उसे समझे अबला,जो नवजीवन सृजन करती तानों के चुभन को चेहरे के हंसी में घोलती राक्षसों के नज़रों के चुभन को झेलती देश चलाती,भरी सभा मे विद्वता दिखाती हर ओहदे की गरिमा बनाये, शुशोभित है देश में अपनी पहचान बनाए वो और कोई नही एक नारी ही हो सकती चांद को छूती,सीमा पे दुश्मनों के छक्के छुड़ाती आज फाइटर भी उसके अधीन आ मुस्कराए जिस वेश को धरती,उसमे ही खो जाती भवानी,दुर्गा,सरस्वती,काली,लक्ष्मी  सब मे बसी हैं मां भवानी। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 7/3/21