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कमी कहां रह गई

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*कमी कहां रह गई* ये दोस्त तेरी दोस्ती को हमने खुदा जाना, हर रिश्ते से पहले दोस्ती का रिश्ता माना, तूने दुनियादारी निभाई हमने दोस्ती निभाई, कमी कहां रह गई मेरे दोस्ती निभाने में। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 11/5/2020

मेरी खामोशी सुन लो

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#मेरी खामोशी सुन लो# काग़ज़ पे मैंने फसाने गढ़े है, लफ्ज़ मेरे खामोश हो गए हैं, तुझसे बस इतनी सी इल्तज़ा है, तुम मेरी खामोशी सुन लो। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 9/5/2020

खामोशियां

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#खामोशियां# मेरे वजूद को भी लोग नकार देते हैं, पर ना जाने ये कैसा राज़ है तुम मेरी खामोशियों को भी सुन लेते हो। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 9/5/2020

रात ठहर गई

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#रात ठहर गई# रात ठहर गई है मुझमें,भोर के इंतजार में, मै ठहरा हूं तुझमें, इश्क ए बयां के इंतजार में, गुजर जाएगी ये स्याह रातें भोर के उजाले में। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 9/5/2020

एक और बात

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एक और बात एक और बात है कि मेरी मुहब्बत हो तुम, मेरी जिंदगी और ख्वाबों कि हकीकत हो, पर दिल - ए- इश्क को ख्वाहिशें नहीं, कि तुम भी मोहब्बत करो मुझसे । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 7/5/2020

बेवजह ही

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    *बेवजह ही* बेवजह ही आशायों का दामन थामे बैठे है, तुझसे मिलने की आरज़ू- ए- इश्क कर बैठे है, तू कल भी थे अजनबी, आज भी वेगाने हो । श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 7/5/2020

तिरछी नज़रों से

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*तिरछी नज़रों से* आज भी मुझे याद आते हैं वो गुजरे दिन, तेरा आना और तिरछी नज़रों देख मुस्कराना, फिर हौले से मुस्कराते पास से गुजर जाना, जाने कहां गए वो सुहाने दिन । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 4/5/2020

जिंदगी मजदूरों सी

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"जिंदगी मजदूरों सी" ज़िन्दगी अब मजदूरों सी हो गई है , गमों में खुशियों का वजूद तलाशती, हालातों का खिलौना है ज़माना, जिस्म से पास और मन से हैं तन्हां । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 1/5/2020

कल ही की बात

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"कल ही की बात" येसे निशान छोड़ जायेंगे हम, येसे पहचान छोड़ जाएंगे हम, लोग बोलेंगे कल ही की तो बात है। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 30/4/2020

नज़रे इनायत

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"नज़रे इनायत" सांवरे कभी मुड के भी देखा करो, राहों में हम बैठे हैं पलके बिछाए , तेरे प्यार भरी नज़रे इनायत के इंतज़ार में। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 29/4/2020

जिंदगी नहीं आसां

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जिंदगी नहीं आसां" जिंदगी इतनी आसां नहीं होती... हर कदम पर कांटे बिछे हैं.... फुल बनकर निकल जाना है... हर जगह कीचड़ है, पर कमल बन निकलना है... हर रास्ते पर भेड़िये हैं..नजरें बचा कर निकल जाना है... श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज