मन का दर्पण
*मन का दर्पण* देखो, मन का दर्पण क्या क्या दिखलाती है हमारे व्यक्तित्व के हर वो पल बताती है जो हम सब से हैं कुछ छुपाते कुछ दिखाते जहां कुछ अपने दिखे,जो हैं चेहरे पे कई चेहरे लगाए कुछ शुभचिंतकों के, जो हर वक्त हैं संग मेरे। मै बैठा था यूंही अनमना सा, कुछ उदास सा हिसाब किताब कर रहा था अपने अहसास का रिश्तों की मर्यादाओं का, उनकी तल्खियों का जमाने की ऊंची नीची, बड़ी छोटी नीतियों का अपने अहंकार का, अपने स्वाभिमान का तभी अंदर से आवाज आई कहां भटक रहे हो देखो,मन का दर्पण, तब करो हिसाब किताब। अपनों के चेहरे झांक रहे थे, उस दर्पण में लुक छुप के कुछ धुंधले से कुछ ऊर्जा से चारों ओर उजाले लिए कुछ मेरी भी थी, मन की भावनाएं छुपे से क्रंदन करते कुछ अभिलाषाएं जिम्मेवारियों का घूंघट ओढ़े आज रूबरू हो रहे थे, जैसे हम अपने आप से । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 26/5/2020 *दूर ले जाएगी* दूर ले जाएगी हमको तुझे भूलने की जिद हमारी आज अकेला बैठा हूं इस सफर में तन्हाइयों को साथ ले जाने की जिद में और मुस्करा देता हूं ये सोचकर कि साथ में...