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मन का दर्पण

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      *मन का  दर्पण* देखो, मन का दर्पण क्या क्या दिखलाती है हमारे व्यक्तित्व के हर वो पल बताती है जो हम सब से हैं कुछ छुपाते कुछ दिखाते जहां कुछ अपने दिखे,जो हैं चेहरे पे कई चेहरे लगाए कुछ शुभचिंतकों के, जो हर वक्त हैं संग मेरे। मै बैठा था यूंही अनमना सा, कुछ उदास सा हिसाब किताब कर रहा था अपने अहसास का रिश्तों की मर्यादाओं का, उनकी तल्खियों का जमाने की ऊंची नीची, बड़ी छोटी नीतियों का अपने अहंकार का, अपने स्वाभिमान का तभी अंदर से आवाज आई कहां भटक रहे हो देखो,मन का दर्पण, तब करो हिसाब किताब। अपनों के चेहरे झांक रहे थे, उस दर्पण में लुक छुप के कुछ धुंधले से कुछ ऊर्जा से चारों ओर उजाले लिए कुछ मेरी भी थी, मन की भावनाएं छुपे से क्रंदन करते कुछ अभिलाषाएं जिम्मेवारियों का घूंघट ओढ़े आज रूबरू हो रहे थे, जैसे हम अपने आप से । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 26/5/2020      *दूर ले जाएगी* दूर ले जाएगी हमको तुझे भूलने की जिद हमारी आज अकेला बैठा हूं इस सफर में तन्हाइयों को साथ ले जाने की जिद में और मुस्करा देता हूं ये सोचकर कि साथ में...

समय की रेत

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    *समय की रेत फिसलती हुई* मुट्ठी से समय की रेत फिसलती हुई सी जा रही है जिंदगी को समझते- समझते उम्र निकलती सी जा रही है मंजिले दूर खड़ी मृगमारिचिका सी चिढ़ाती हैं हमें अपनो को सवांरते- संवारते वेगाने से बन बैठे हैं हम दूर कहीं खड़ी कामयाबियों की मंजिलें बुला रही हैं हमें और कर्तव्य पैरों में बेड़ियां डाले मुस्करा रही हो जैसे मैंने भी हंसकर कहा मंजिलों से कर्तव्यों से बड़ी नहीं कामयाबियां रेत पे तो नाम लिख दूं मैं पर समय की आंधी उड़ा ले जाएगी क्यूंकि रेत तो आधीन है उन हवाओं और लहरों की तो क्यूं ना मै समय की रेत को रिश्तों के अहशाशों से भिगो दूं और भीगी हुई रेत को मुट्ठियों में भर जी लूं। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 24/5/2020        *थोड़े से सुख के लिए* थोड़े से सुख के लिए क्या पाया और क्या गंवाया आज देख लो सड़कों को नापते इन लड़खड़ाते नंगे पैरों को जीवन की आस में मौत की तरफ बढ़ते इस रेले को। श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 24/5/2020  *आराम करो आराम का दिन है* आज बड़े प्यार से जब तुमने कहा था मुझे आज आराम करो आराम का...

तुमको देखे हुए

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    *तुमको देखे हुए* तुमको देखे हुए जमाने बीत गए पर लगता है जैसे आज की ही बात हो और पलकें बन्द कर तेरा अक्स देख लेता हूं। तुमको देखे हुए जमाने बीत गए पर आज भी जब उन गलियों से गुजरता हूं वहां की हवाओं में बिखरी तेरी खुशबू समेट लेता हूं। तुमको देखे हुए जमाने बीत गए पर आज भी उन फिजाओं में तेरे कहकशे गूंजते हैं और मैं उन कहकशों में तेरी शिकायतें सुन लेता हूं। तुमको देखे जमाने बीत गए पर आज भी जब गुजरता हूं तेरी गलियों से तुझे देखने की चाह में ठिठक सा जाता हूं पर अब उन गलियों में ना तो कोई अधखुली सी खिड़कियां है ना ही सहेलियों से गप्पे लड़ाती गुजरती हुई तेरी तिरछी निगाहें। और मैं इन गलियों से घायल दिल समेट लाता हूं । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 23/5/2020      *कुछ qoutes*        *छुप नहीं सकते तुम* छुप नहीं सकते तुम चाहे लाख डाल लो परदे मै वो हवा का झोंका हूं तुम्हे हौले से छू जाता हूं।        *ये ठंडी हवा का झोंका* ये ठंडी हवा का झोंका जैसे तेरा पैग़ाम लाया हो तुझे छू कर तेरी खुशबू को...