दीया हूँ मै

आज मैं अपनी रचना के माध्यम से एक दीया की रौशनी की जुझारूपन,उसका स्वभिमान,और हौसले को प्रदर्शित करने का प्रयास की हूं।



       *दीया*

दीया हूँ मैं
खुद जल दूसरों को करती रौशन
मेरे चहूं ओर है अंधेरा-हवा रुपी दुश्मन
न जाने किस ओर से आ जाएँ
या आ जाएँ चारों ओर से और घेरे मुझे।

पर मै भी टिकी ,अपने अडिग पथ पे
लड़ूंगी, हारूँगी नहीं,जब तक है साँस
जानती हूँ अंजाम अपना
पर लड़ूंगी हारूँगी नहीं
क्योंकि मै हारी तो,जीत जाएगा अंधेरा।

मेरी हिम्मत बढ़ जाती है तब
जब इस चकाचौन्ध में भी
पूजा में मेरी ही जरूरत भाती है सबको।

मुझे संतोष है इस बात से
आज भी मेरी रौशनी में चहकते बच्चे,
मुझे रौशन कर 
लोगों के चेहरों पे छा जाती अलबेली मुस्कान।

बिजली की लड़ियों में भी नही वह शक्ति,
जो शक्ति है मेरी लरजती रौशनी में
क्योंकि आज भी मंदिरों में मै ही जलती 
गांवों के उन मिटटी के घरों में रौशनी मै ही देती
आरती के थालों में भी मै ही हूं सजती ।

इन अहमियतों को याद कर बढ़ जाती मेरी मुस्कान
हवा रूपी दुश्मन से लड़ने की शक्ति हो जाती दुगुनी।

दीया हूँ मै
दूसरों को रौशन करना मेरा काम ।


📝श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
12/11/17

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