मासूम बचपन
मेरी यह रचना उनको समर्पित हैं।जो अपने कार्यानुभव को ही अपनी उपलब्धि बना लिए हैं।
*मासूम बचपन*
मंदिर की सीढ़ियों पे मिला
जवाबदेही से लिपटा बचपन
सड़कों के किनारे मिला
जिम्मेवारियों को ढोता बचपन
मैं रुकी
सहसा ठिठकी,मन में उठे कई सवाल
सहसा पूछ ही बैठी,स्कूल कब जाते हो ?
जवाब मिला
स्कूल जाने से पेट नहीं भरता साहब
ज़िन्दगी जीने की लड़ाई भी तो एक पाठशाला है।
भले ही हम स्कूल नहीं जाते
पर ज्ञान हमें भी तो कम नहीं ?
न तो जीने के लिए हम
दूसरों के सामने हैं हाथ फैलाते
न ही घर में बैठ
पैदा करने वाले को हैं कोसते।
हमने जब
सरकारी सुबिधाओं का दिया हवाला
तो मासूम बचपन
विश्वास से लबरेज हंसी में बोला,
सरकारी सुबिधा ....हा हा हा वो हमे मिलती कहाँ है ?
सरकारी सुबिधा तो कागजों पे ही बंट जाती है
हम तक पहुँचने से पहले ही कहीं खो जाती है
वो तो बस एक मृगमरीचिका है
जो दूर से है लगती भली।
वो तो बस भ्र्ष्टाचार का बढ़ावा है,
जिसके बल पे
फल-फूल रहे सरकारी दफ्तर
छुपती-छुपाती हम तक आ भी जाती है तो
हमें भी लपेटे में लेकर निट्ठल्ला बना जाती है।
सरकारी सुबिधा से भली हमारी मेहनत
कम से कम संतोष का आन्नद तो दे जाती है
मै निस्तब्ध सुन रही थी उसकी मासूम बातें
दिल को छू रही थी उसकी सच्चाई से भरी बातें।
📝श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
14/11/17
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