"कुछ लोग"

                        "कुछ लोग"

आज मार्केट में हॉस्टल वाली सीता दीदी को देख कर पुरानी यादें ताज़ा हो गई ।जब हॉस्टल में 1995 में एक साथ रहा करते थे हम।

मै अपने घर से पहली बार हॉस्टल में आई थी तो थोड़ा डरी-डरी सी रहती थी। उस समय मेरी बैचमेट के अलावा गीता दीदी,सुनीता दीदी, प्रतिमा दीदी और सीता दीदी जो मेरी सिनीयर  थी हमेशा मुझे स्पोर्ट किया करती थी। सीता दीदी से थोडा ज्यादा लगाव हो गया था।

उस समय एक बहुचर्चित फ़िल्म आई थी दीवानगी।जिसके चर्चे हर किसी के ज़बान पे थी। और 'पायलिया' गाने ने तो जैसे धूम मचा रखा था। दोस्तों के साथ फ़िल्म देखने का यह मेरा पहला मौका था।इसके लिए भी हमे कम पापड़ नहीं बेलने पड़े थे।क्योंकि उस समय मोबाइल का आविष्कार हुआ नहीं था,और फोन से बातें भय मिडिया के द्वारा होती थी।और मै बिना अपने पापा जी के अनुमति के फ़िल्म देखने जाना नहीं चाहती थी। खैर पापा जी से तो बात नहीं हो पाई पर माँ से इजाज़त मिल गई। क्योंकि फ़िल्म के लिए हमारे हॉस्टल की वार्डन ने खुद 20 छात्रों का टिकट बुक करवाया था।

हम सभी फ़िल्म से ज्यादा इस बात से उत्साहित थे की हम सभी दोस्त एक साथ फ़िल्म देखने जा रहे थे ,वो भी वार्डन और पैरेंटस की अनुमति से। हमारी वार्डन विमेंस कॉलेज की प्रिंसिपल भी थी, इसलिए शहर में उनका काफी रसूख था। वार्डन ने सुरक्षा को लेकर सीनियर को जिम्मेवारी दी थी की रो के किनारे सीनियर बैठेंगे और बिच में हम सभी जूनियर।सीता दीदी भी किनारे ही बैठी थीं और संयोग से वो पायल पहनी हुई थी।

ठीक उनके पीछे एक मनचला लड़का बैठा था जो पायलिया गाना आने पे दीदी को परेशान करने लगा। और उसका वो सिलसिला पूरी फ़िल्म तक चलता रहा। अंत में जब फ़िल्म समाप्त हुई और हम सभी जाने के लिए उठे तो सीता दीदी ने उस लड़के को एक जोरदार चांटा मारा और बोली- क्यों बे तुम्हारे घर में बहन नहीं है ? इतना ही शौक है पायल पहनाने का तो पहले काम कर अपनी बहन को पहना।सभी सीनियर दीदी ने उस लड़के को खूब डांटा ।और हमसभी जूनियर एक दूसरे का मुँह देख माजरा समझने की कोशिस करने लगे।

उस दिन से हॉस्टल में सीता दीदी पायलिया के नाम से मशहूर हो गई।आज भी हमलोगों की हॉस्टल की यादें इस घटना को याद किये बगैर पूरी नहीं होती।

और आज सहशा उन्हें इतने सालों बाद अपने सामने देख वो यादे ताज़ा हो गई।और हम दोनो उस घटना को याद कर खूब हंसे। मेरा घर मार्किट से पास ही है तो मै दीदी को अपने घर ले गई। वो काफी देर रुकी और फिर आने को कह कर चली गई।

मै सोचती हूँ की दानव किसी भी काल में कम नहीं होते। ये विकृत मानसिकता वाले कुछ लोग हर समय हर जगह मौजूद होते हैं। उनकी ये कुत्सित मानसिकता वाली हरकतें दूसरे को कितनी पीड़ा देती है, ये लोग कभी नहीं सोचते। ये कल भी थे,आज भी हैं और कल भी रहेंगे। बस जरुरत है इनसे सावधान रहने की,ऐसी स्थिति में उस पीड़िता का साथ देने की। क्योंकि ऐसी घटनाएं तो कुछ लोगों का मनोरंजन का साधन होती है। पर जिसके साथ बीतता है उसकी मानसिक पीड़ा का तो अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। काश की हम उस पीड़िता के दर्द को समझते, तो, क्या हम उसका मजाक बनाने की हिम्मत कर पाते ??


             ..............📝श्रीमती मुक्ता सिंह

Comments

Post a Comment