ऐसे भी होते हैं औलाद
"ऐसे भी होते हैं औलाद"
आज बहन के घर जाते हुए, उसके मोहल्ले में एक आलिशान भवन पे नज़र पड़ी। उसकी सुंदरता हम निहार ही रहे थे की बरामदे में एक बुजुर्ग की दयनीय हालात देख नज़र जैसे ठिठक सी गई।मै उनके बारे में ही सोचते हुए की वो कौन थे? बहन के घर दाखिल हुई।
अंदर जाकर मै बच्चों बड़ों से मिलकर बातों में भूल गई। और इधर-उधर की बातें होने लगी। इसी बातचीत के क्रम में उस मकान की भव्यता की भी चर्चा होने लगी। तभी मेरी बहन बोली क्या फायदा ऐसा आलिशान मकान बनवाने से ,जब मकान बनवाने वाले की हालात आज भिखारियों सी हो।
मैंने पूछा उनकी ये हालात कैसे हो गई? तभी मेरी बहन बताने लगी की बेचारे वो बुजुर्ग सालभर पहले सीसीएल से रिटायर हुए हैं। उनका एक ही एकलौता बेटा-बहु और एक पोता है। अभी 6 महीने पहले ही धर्मपत्नी गुजर गई हैं। बेचारे ने बहुत चाव से घर बनवाया था रहने के लिए ,पर एक कमरा तो क्या एक चारपाई भी उन्हें नसीब नहीं है। पत्नी के गुजरने के बाद दूध लाना, सब्जी लाना , बच्चे को लाना और भी नोकरों वाले सारे काम ये ही करते हैं। और सोने को बस ये गलियारे के ज़मीन में बिछा गदा और एक कम्बल है ।और बर्तन के नाम पे एक थाली कटोरी गिलास और एक स्टील का लोटा है। उसी लोटे से बाहर चापानल पे ये नहाते भी हैं और नित्य क्रियाकर्म भी करते हैं।
बेचारे ने अपनी मेहनत की सारी जमा पूंजी लगा दी थी इस मकान को बनाने में। उनकी व्यथा सुन मेरी आँखे भर आई अफशोस के भाव अनायास ही मुख पे झलकने लगी।और मन में कितने ही द्वन्द उठने लगे और मेरी जबान पे बस एक ही बात थी की इससे तो अच्छा होता की वो बेअवलाद होते।
ऐसा तो मैंने सिर्फ किस्से कहानियों में सुना था और एक बहुत पुरानी फ़िल्म में देखी थी।आज वो मेरे सामने हक्कीकत में घटित हो रही थी।मन विस्वाश करने को नहीं कह रहा था पर हकीकत तो हकीकत थी। फिर मन में सवाल उठने लगे की कोई बच्चा इतना निर्दयी कैसे हो सकता है? साथ ही अहशास हुआ की पति-पत्नी का साथ कितना जरुरी होता है । दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। आज अगर उनकी पत्नी होती तो शायद उनकी ऐसी हालात नहीं होते।
...........📝श्रीमती मुक्ता सिंह
आज बहन के घर जाते हुए, उसके मोहल्ले में एक आलिशान भवन पे नज़र पड़ी। उसकी सुंदरता हम निहार ही रहे थे की बरामदे में एक बुजुर्ग की दयनीय हालात देख नज़र जैसे ठिठक सी गई।मै उनके बारे में ही सोचते हुए की वो कौन थे? बहन के घर दाखिल हुई।
अंदर जाकर मै बच्चों बड़ों से मिलकर बातों में भूल गई। और इधर-उधर की बातें होने लगी। इसी बातचीत के क्रम में उस मकान की भव्यता की भी चर्चा होने लगी। तभी मेरी बहन बोली क्या फायदा ऐसा आलिशान मकान बनवाने से ,जब मकान बनवाने वाले की हालात आज भिखारियों सी हो।
मैंने पूछा उनकी ये हालात कैसे हो गई? तभी मेरी बहन बताने लगी की बेचारे वो बुजुर्ग सालभर पहले सीसीएल से रिटायर हुए हैं। उनका एक ही एकलौता बेटा-बहु और एक पोता है। अभी 6 महीने पहले ही धर्मपत्नी गुजर गई हैं। बेचारे ने बहुत चाव से घर बनवाया था रहने के लिए ,पर एक कमरा तो क्या एक चारपाई भी उन्हें नसीब नहीं है। पत्नी के गुजरने के बाद दूध लाना, सब्जी लाना , बच्चे को लाना और भी नोकरों वाले सारे काम ये ही करते हैं। और सोने को बस ये गलियारे के ज़मीन में बिछा गदा और एक कम्बल है ।और बर्तन के नाम पे एक थाली कटोरी गिलास और एक स्टील का लोटा है। उसी लोटे से बाहर चापानल पे ये नहाते भी हैं और नित्य क्रियाकर्म भी करते हैं।
बेचारे ने अपनी मेहनत की सारी जमा पूंजी लगा दी थी इस मकान को बनाने में। उनकी व्यथा सुन मेरी आँखे भर आई अफशोस के भाव अनायास ही मुख पे झलकने लगी।और मन में कितने ही द्वन्द उठने लगे और मेरी जबान पे बस एक ही बात थी की इससे तो अच्छा होता की वो बेअवलाद होते।
ऐसा तो मैंने सिर्फ किस्से कहानियों में सुना था और एक बहुत पुरानी फ़िल्म में देखी थी।आज वो मेरे सामने हक्कीकत में घटित हो रही थी।मन विस्वाश करने को नहीं कह रहा था पर हकीकत तो हकीकत थी। फिर मन में सवाल उठने लगे की कोई बच्चा इतना निर्दयी कैसे हो सकता है? साथ ही अहशास हुआ की पति-पत्नी का साथ कितना जरुरी होता है । दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। आज अगर उनकी पत्नी होती तो शायद उनकी ऐसी हालात नहीं होते।
...........📝श्रीमती मुक्ता सिंह
☺👏👍✌
ReplyDeleteBitter but real
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