सोने की पायल पाजेब

      "सोने की पायल"
सोने की पायल हाँ सोने पायल या पाजेब,
बचपन से थी अंकित मानस पटल पर,
जाने कहाँ देखी थी वो सुन्दर सी पायल,
शायद कहीं पढ़ी हो किसी कहानियों में,
या उपन्यास की नायिका की पैरों में खनकी हो,
या देखा था शायद किसी फ़िल्मी नायिका के पैरों में।

न जाने उसमे थी कैसी आकर्षण,
वह सुनहला सा लिपटा पैरों में,
उसकी घुँघरुओं की धुन गूंजती थी कानो में,
ढेर सारी घुँघरुओं की छन-छन,
उन घुँघरुओं की धुन में न जाने थी कैसी मिठास,
जो कोयल से भी मीठी धुन घोलती थी कानो में।

तभी किसी ने बताया की उसे तो कहते हैं पाजेब,
पायल तो होती है पतली सी,
तभी सहसा दिखी आजी की बक्से में,
उसकी वो झलक थी कितनी मोहक,
वो चौड़ी सी घुँघरुओं से भरी,
छोटी-छोटी घुंघरू एक लय में थे गुंथे सारे,
एक बार हवा में झनझोरने से बज उठे सारे,
उसकी उस आवाज में न जाने थी क्या जादू।

यह सोने की पाजेब मन को बड़ा लुभाता है,
पिया के दिल को बांधती है इसकी छनक,
इसकी एक छनक छेड़ जाती है मन के तार,
जैसे बज रही हो सारे सरगमों की झंकार,
यही पाजेब की आवाज बताती है पहचान,
कि घूँघट में लिपटा आ रहा है कौन,
पायल की खनक बन जाती है दुल्हन की पहचान।
              ..........📝श्रीमती मुक्ता सिंह



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