मासूम सवाल
*मासूम सवाल*
जब भी राजनीती की रोटी सिकती है सड़कों पे,
आफत टूटती है सबसे ज्यादा बच्चों पे,
बच्चे भूख- प्यास से रहते हैं बेहाल,
और विकास की झूठी राजनीती करते हैं नेता,
इनसे है मेरा बस एक ही सवाल ?
क्या मैदान कम पड़ गए राजनीती के लिए,
क्या सड़को पे होगा हंगामा,तभी होगा विकास,
इनके पास न है कोई मुद्दा, फिर भी हैं सड़के घेरे।
हंगामा करने वालो, एक नज़र तो डालो मासूमों पे,
जब आप होंगे रजाइयों में दुबके,ऐसी में बैठे,
उस समय ये मासूम निकले होंगे अपनी कर्मभूमि को,
शायद नाश्ता भी न किया होगा ढंग से,
मन में होगा बस एक ही डर, कहीं छूट न जाये बस,
आठ घंटे बाद लौटे हैं ,अपनी खुशियाँ ढूंढने,
माँ का आँचल,गर्म खाना, परिवार का प्यार पाने ।
पर आपको क्या इन सब बातों से,
आपको तो करनी है अपनी राजनीती,
मासूम रहे परेशान, आपको तो करना है जाम,
सड़क पे होगा हंगामा, तभी आपको मिलेगी पहचान।
इस ड्यूटी पे लगे प्रशाशन से करो जब सवाल,
प्रशाशन मज़बूरी के नाम पे है पल्ला झाड़ती,
कहती है हम हैं मजबूर वर्दी पे लगे अशोक स्तम्भ से।
नन्ही सी आँखे,मासूम चेहरे पर है एक ही सवाल,
क्या है हमारा कसूर इन मुद्दों में ?
राजनितिक लाभ की बाली हम क्यों हैं चढ़ते ?
यह झुलसाती गर्मी,ठिठुरती ठंढ हम क्यों झेलें ?
अब इन मासूमों के सवालों का जवाब कौन देगा,
इनके तकलीफों का हिसाब कौन देगा ?
...........📝श्रीमती मुक्ता सिंह

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