"याद आता है गुजरा ज़माना"

"याद आता है गुजरा ज़माना"

बड़ा याद आता है वो गुजरा ज़माना,
वो चाय की चुस्की,पालक मिर्ची का पकौड़ा,
साइकल चला दस किलोमीटर आना,
दोस्तों की वो महफ़िल, अधखुली सी वो खिड़की।

जाड़े के दिनों में कई प्याले चाय की वो चुस्की,
गर्मियों में खुल जाती थीं कोल्ड्रिंक को कई बोतलें,
दोस्तों का वो ठहाका मार कर बेफिक्री की हंसी,
राजनीती की वो बातें, अनगिनत सी योजनाये,
और वो अधखुली खिड़की से किसी की झलक।

क्या दिन थे वो भी मस्ती भरे,
ना जिम्मेवारियों का था बोझ,
न थी समस्यायों की गठरी,
बस था  तो दोस्तों की महफ़िल,
और सारे ज़माने की अनसुलझी सी बाते ,
और अधखुली खिड़की से झांकते दो नयन,
बड़ा याद आता है वो गुजरा ज़माना ।

आज भी वो चायवाला रहता है वहीँ,
वही चाय पकौड़े की खुशबु मनमोहति सी,
पर न वो दोस्तों की ठहाकों की महफ़िल है,
ना है वो अधखुली सी खिड़की,
बहुत याद आता है वो गुजरा ज़माना।



          ...........📝श्रीमती मुक्ता सिंह





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