सीनियर बबीता जी

             *सीनियर बबीता जी*


          आज फेसबुक पे अपने सीनियर बबीता जी की आत्मविश्वास से भरी तस्वीर देख सहसा मुझे उस दिन मास कॉम डिपार्टमेंट की वो मुलाकात याद आ गई। उस दिन बड़े दिनों बाद बबीता जी को डिपार्टमेंट में देख मुझे जहाँ एक ओर ख़ुशी हो रही थी, वहीं उनका बुझा हुआ चेहरा देख आश्चर्य भी हो रहा था । क्योंकि इन्हे पुरा डिपार्टमेंट एक जिंदादिल की छवि में पहचानता था।ऊपर से ये नई नवेली दुल्हन थी ,जिनकी शादी कुछ महीने पहले ही हुई थी। जहाँ एक ओर नई नवेली दुल्हन का चेहरा नया संसार बसाने की उमंग और नया नीड़ गढ़ने की खुशियों से लबरेज रहता है , वहीँ पर उनके चेहरे पे उसकी नाममात्र की भी ख़ुशी दिख नहीं रही थी ।
           
            मै इसी उहापोह में थी की इनकी उदासी का कारन पूछूँ या न पूछूँ ? फिर भी हिम्मत कर शिकायत भरे लहजे में मै बोली क्यों बबीता जी आपने शादी में मुझे निमंत्रण भी नहीं दिया ।

             भले ही वो मेरी सीनियर थी क्लास में पर उम्र में मै बड़ी थी इसलिए बबीता जी मेरा काफी रिस्पेक्ट करती थी ।शादी की बात करते ही न चाहते हुए भी उनकी आँखे भर आई। और आंसू की बुँदे प्यार की बोल की गर्मी पा कर गालों पे ढुलक सी गई ।

               मै अपने सवाल पे खुद ही को कोसने लगी की क्यों पूछा मैंने ।पर दूसरी तरफ मेरे मन में उथल-पुथल भी मची हुई थी कि आखिर ऐसा इनके साथ क्या हुआ की ये इतनी बुझी-बुझी सी हैं ।वो तो घरेलु होने के साथ-साथ काम में भी दक्ष हैं । और अच्छे पढ़े लिखे परिवार से भी आती हैं ।इनके पापा भी डॉक्टर हैं ।मेरे मन में चल रहे अंतर्द्वंद को बबिता जी भी भांप गई, शायद इसीलिए अपना नया न. देकर बोली फ़ोन से बात करेंगे, और चली गयी ।

            मै इसी उधेड़-बन में घर आ गई की आखिर ऐसा क्या हुआ है उनके साथ ? खैर शाम को मै घर के कामों को निपटाकर अपनी जिज्ञासा को संत करने के लिए बबिता जी को फ़ोन लगाई तो वो फफक-फ़फ़क कर रो पड़ी ।उन्होंने बताया की पटना एक शादी में गई थीं ,वहीँ लड़के वालों ने उन्हें पसंद कर लिया । उनके पापा भी अच्छा घर -वर देख शादी के लिए राजी हो गए। और सभी रीती- रिवाज, लेन-देन कर शादी कर दिए ।पर उनके ससुराल की हक़ीक़त उनके वहां जाने के बाद खुली ।उन्हें अपने ससुराल में जाकर पता चला की लड़के वालों को बबिता जी अच्छी नहीं लगी थीं,उनके पाप की दौलत अच्छी लगी थी ।

               लड़के वालों की सारी डिमांड पूरा करने के बाद भी ,उनका लोभ कम नहीं हो रहा था ।हर दस दिन में नया डिमांड कर देते थे ।अभी भी बबिता जी टीचर की नौकरी के लिए फॉर्म भरने के लिए सर्टिफिकेट निकालने के बहाने यहाँ आई हैं ।आगे बोली की देखते हैं किस्मत में मेरे क्या लिखा है।
उनके ये दुःख भरी कहानी सुनकर मुझे इससे मिलती-जुलती तीन और कहानी आँखों के सामने घूमने लगी । जिसे मै देख चुकी हूँ ।खैर आज वो सुखी हैं और आत्मविश्वास से भरा जीवन व्यतीत कर रही हैं ये देख कर ही शांति मिलती है ।

          पर उनकी ये दुःख भरी कहानी सुनकर मै सोचने को विवश हो गई कि - क्या किसी को अपनी क्षमता पे भरोसा नहीं होता है ? जो की लोग पत्नी और बहू को दहेज के लिए प्रताड़ित करते है ।

                 .............📝श्रीमती मुक्ता सिंह

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