न याद करूँ
"न याद करूँ"
भरी महफ़िल में हम अकेले थे,
बहुत कोशिश किये की ना याद करूँ,
पर भूलते तब तो तुम्हे न याद करते।
चारो ओर थी संगीत की महफ़िल,
हो रहा था सुर और ताल का संगम,
पतझड़ भी बसंत लग रहा था,
कोशिशे तो बहुत की न याद करने की,
पर जख़्म और गहरा हो गया ।
क्या दिन थे वो भी जब हम साथ थे,
क्या दिन है ये जब हम यादों में हैं,
फिर आएगा वो दिन जब हम साथ होंगे।
.............📝श्रीमती मुक्ता सिंह
भरी महफ़िल में हम अकेले थे,
बहुत कोशिश किये की ना याद करूँ,
पर भूलते तब तो तुम्हे न याद करते।
चारो ओर थी संगीत की महफ़िल,
हो रहा था सुर और ताल का संगम,
पतझड़ भी बसंत लग रहा था,
कोशिशे तो बहुत की न याद करने की,
पर जख़्म और गहरा हो गया ।
क्या दिन थे वो भी जब हम साथ थे,
क्या दिन है ये जब हम यादों में हैं,
फिर आएगा वो दिन जब हम साथ होंगे।
.............📝श्रीमती मुक्ता सिंह
Comments
Post a Comment