स्वाभिमान और चाटुकारिता

"स्वाभिमान और चाटुकारिता"

लोभपरस्ती को इस दुनिया में,स्वाभिमान विकता है,
गैरों के उपकार तले,स्वाभिमान अभिमान बनता है,
स्वार्थसिद्धि की बाजार में चाटुकारों का बोलबाला है,
झूठी शान बढाने को लोग गदहे को बाप बनाते है।


सम्मानों के उच्च मंच पर,स्वाभिमान चाटुकार बनता है,
लालच के खूंटी पे , स्वाभिमान को टँगते देखा है,
अन्यायी के घातों से स्वाभिमान को कुचलते देखा है,
आज पैसों से स्वाभिमान को लगती है बोली ।

स्वाभिमान की परिभाषाएं अब कागजों तक सिमित है,
समाज कल्याण की भावना,सिमटी स्वार्थी गलियों में,
राष्टप्रेम की परिभाषाएं,अब बानी दादी नानी की कहानियाँ,
बच्चों को अब कंप्यूटर, सोशल मीडिया से फुरसत नहीं,
कहाँ सीखेंगे पंचतंत्र की कहानियों से स्वाभिमानी बनना,
धन्य है वो ,जिसने स्वाभिमान का न किया सौदा,
गैरों के उपकार के बदले धिक्कार समझा जीवन को,
परिस्थितियां न आडे आई स्वाभिमान के इरादे,
मान सम्मान की गरिमा, आती है स्वाभिमान से,
चाटुकारिता के छप्पन भोग से भली है,
स्वाभिमान की सुखी रोटी
हे मानस स्वाभिमान के बिना जीवन पे धिक्कार है।

             .........📝श्रीमती मुक्ता सिंह

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