पतंग के दीवाने और चाचा जी
"पतंग के दीवाने और चाचा जी"
हमारे भारत में बच्चों के खेल में से एक पसंदीदा खेल पतंग का भी है ।और इसे मान्यता भी प्राप्त है की संक्रान्त के दिन पतंग जरूर उड़ाया जायेगा ।
पतंग का खेल सिर्फ बच्चों को ही नहीं भाता बड़े भी बड़े चाव से इसे उड़ाते हैं ,और जब किसी का पतंग काटते हैं तो ऐसे विजयी मुस्कान देते हैं कि, जैसे भारत और पाकिस्तान या भारत और चाइना का जंग जीत लिए हों।
इस पतंग के खेल में दांव पे प्रतिष्ठा के साथ -साथ कई बार बाज़ी भी लगी होती है ।हमारे एक परिचित ने जो अपने अनुभव हमसे साझा किये उसे सुन कर हँस-हँस कर मेरे पेट में दर्द हो गए ।पर हंसी न रुकी ।
मेरी एक न्यूज चैनल की दोस्त है उसकी अभी एक साल पहले ही शादी हुई है ।उसके पतिदेव प्रेम जी बिलकुल अपनी नाम की तरह ही हैं हंसमुख ।उनके चेहरे पे हमेशा मुस्कान बनी रहती है और वो जहाँ भी रहते हैं किसी भी गंभीर माहौल हो एकदम से बदल देते हैं ।और सामने वाले के चेहरे पे मुस्कराहट ले आते हैं। सबसे बड़ी बात है कि वो मेरी दोस्त का हर कदम पे साथ देते हैं , और उसके चेहरे पे कभी उदासी की परछाईं भी नहीं आने देते ।
उस दिन यूँही बात निकली बचपन की शैतानियों पे और पतंग पे तो ,मेरी दोस्त जो मुझे दीदी बोलती है बोली कि दीदी को वो पतंग वाली बात बताइये ना । प्रेम जी बोले कि जानते हैं दीदी जब हम छोटे थे सात या आठ साल के तब हमारे चाचा जी एक दिन बोले की बेटा हमारी गली की नुक्कड़ पे जो पंसारी का दुकान है वहां से खैनी ले आना और मुझे पच्चास रुपये दिए ।मै उस समय कुछ नहीं बोला । क्योंकि मुझे पतंग खरीदनी थी ।और घर में सभी बड़ों से पैसे मांगे तो सभी ने मना कर दिया था ।और बाहर मेरे दोस्त मेरा पतंग लाने का इंतज़ार कर रहे थे ।और ऐसे में चाचा जी के द्वारा दिया हुआ ये पैसा उसी कहावत को चरितार्थ कर गया कि -"बिन मांगे मोती मिले,मांगे न मिले भीख" ।
मै चाचा जी के पैसे से जाकर ढेर सारा पतंग खरीद कर अपने दोस्तों में अपनी रौब जमाने लगा । और छुट्टी के दिन थे इसलिए पतंगबाज़ी कर के शाम को घर लौटा । चाचा जी कितने बार मेरे लिए पुछ चुके थे की मै आया या नहीं ।खैर जब मै घर लौटा तो यह बात भूल चूका था की चाचा जी ने मुझे पैसे किसलिए दिए थे ।थोडा -थोडा अँधेरा हो चला था तो चाचा जी घर लौटे और मुझे आवाज लगाये ,प्रेम सुबह पैसा दिये थे तुम्हे खैनी लाने को कहाँ रखे हो ।सुनकर मै तो अकबका गया की अब क्या करूँ। तभी मेरे शैतानी दिमाग में एक युक्ति आई।मै तुरंतअपने बगीचे में गया और जहां गेंदा का ढेर सारा फूल लगा हुआ था । जिसमे कुछेक पौधे सुख गए थे ,मै तुरंत अँधेरे में ही उन सूखे पत्तों को उसमे लगे जालों के साथ ही तोड़ कर खूब रगड़ रगड़ कर खैनी का आकार दे दिया ।और चाचा जी को जाकर दे दिया ।
उस समय थोडा बिजली की भी परेशानी रहती थी तो सभी जगह लालटेन ही जल रहा था । अब चाचा जी किसी भी तरह से खैनी को बनाये ,उन्हें वह स्वाद ही न आये ।और वो बार -बार मुझसे पुछे की तुम नुक्कड़ वाले पंसारी से ही खैनी लाये हो ना , मै अपनी शैतानी पे मुस्कराते हुए बोल देता जी चाचा जी ।और अपने चाचा जी को सवालों के भँवर में छोड़कर मै तो मस्ती से खाना खा कर सो गया कि अब कल क्या होगा ये कल देखेंगे ।
सुबह जब नुक्कड़ वाले पंसारी ने दुकान खोला तो चाचा जी उसके दुकान पहुँच गए ।और बोले कि कल मेरा भतीजा खैनी लेने आया था तो तुम कैसा खैनी दे दिए थे । तब दुकानदार चाचा जी का मुंह देखते हुए बोला की नहीं मालिक कल तो बबुआ साहब दुकान से खैनी नहीं ढेर सारा पतंग ले गए थे।अब चौकने की बारी मेरे चाचा जी की थी ।जब उन्होंने अपने पॉकेट से मेरे शैतानी दिमाग द्वारा बनाया हुआ खैनी पंसारी को दिखाया तो उसने मेरा राज़ खोला की ये तो गेंदे के फूल का सूखा पत्ता है। चाचा जी ने भी जब ध्यान से देखा तो उन्हें अब मेरी शैतानी साफ नज़र आ रहा था ।अब मेरे खोजाने की बारी थी ।चाचा जी जब मुझे डांटने के लिए खोज रहे थे तब तक मै अपने बचने का उपाय कर चूका था ।मैंने घर के सबसे मजबूत अदालत दादा जी के अदालत में अपनी फरियाद लगा दी थी ।कि कल किसी ने मुझे पतंग खरीदने के लिए पैसे नहीं दिए तो मै ये काम कर चूका हूँ।अब मेरे बजाये चाचा जी की डंटाने की बारी थी ।चाचा जी जब मुझे डांटने वाले थे , उसी समय दादा जी आकर चाचा जी को ही डांट लगाई कि , इतने छोटे बच्चे से खैनी मंगाया जाता है। घर में जिसने भी इस किस्से को सुने ,सभी जहाँ मेरी शैतानी पे हंसे बिना बही रह पाये, वहीँ चाचा जी को सभी ने बोला की दादा जी सही कह रहे हैं । इतने छोटे बच्चे से कहीं खैनी मंगाया जाता है ।
मै प्रेम जी का यह पतंग की दीवानगी के लिए किया हुआ यह शैतानी सुनकर खूब हंसी । पतंग की दीवानगी की और भी कई किस्से जो मै सुनी हूँ आगे आपलोगों के साथ साझा करुँगी ।
.............📝श्रीमती मुक्ता सिंह
हमारे भारत में बच्चों के खेल में से एक पसंदीदा खेल पतंग का भी है ।और इसे मान्यता भी प्राप्त है की संक्रान्त के दिन पतंग जरूर उड़ाया जायेगा ।
पतंग का खेल सिर्फ बच्चों को ही नहीं भाता बड़े भी बड़े चाव से इसे उड़ाते हैं ,और जब किसी का पतंग काटते हैं तो ऐसे विजयी मुस्कान देते हैं कि, जैसे भारत और पाकिस्तान या भारत और चाइना का जंग जीत लिए हों।
इस पतंग के खेल में दांव पे प्रतिष्ठा के साथ -साथ कई बार बाज़ी भी लगी होती है ।हमारे एक परिचित ने जो अपने अनुभव हमसे साझा किये उसे सुन कर हँस-हँस कर मेरे पेट में दर्द हो गए ।पर हंसी न रुकी ।
मेरी एक न्यूज चैनल की दोस्त है उसकी अभी एक साल पहले ही शादी हुई है ।उसके पतिदेव प्रेम जी बिलकुल अपनी नाम की तरह ही हैं हंसमुख ।उनके चेहरे पे हमेशा मुस्कान बनी रहती है और वो जहाँ भी रहते हैं किसी भी गंभीर माहौल हो एकदम से बदल देते हैं ।और सामने वाले के चेहरे पे मुस्कराहट ले आते हैं। सबसे बड़ी बात है कि वो मेरी दोस्त का हर कदम पे साथ देते हैं , और उसके चेहरे पे कभी उदासी की परछाईं भी नहीं आने देते ।
उस दिन यूँही बात निकली बचपन की शैतानियों पे और पतंग पे तो ,मेरी दोस्त जो मुझे दीदी बोलती है बोली कि दीदी को वो पतंग वाली बात बताइये ना । प्रेम जी बोले कि जानते हैं दीदी जब हम छोटे थे सात या आठ साल के तब हमारे चाचा जी एक दिन बोले की बेटा हमारी गली की नुक्कड़ पे जो पंसारी का दुकान है वहां से खैनी ले आना और मुझे पच्चास रुपये दिए ।मै उस समय कुछ नहीं बोला । क्योंकि मुझे पतंग खरीदनी थी ।और घर में सभी बड़ों से पैसे मांगे तो सभी ने मना कर दिया था ।और बाहर मेरे दोस्त मेरा पतंग लाने का इंतज़ार कर रहे थे ।और ऐसे में चाचा जी के द्वारा दिया हुआ ये पैसा उसी कहावत को चरितार्थ कर गया कि -"बिन मांगे मोती मिले,मांगे न मिले भीख" ।
मै चाचा जी के पैसे से जाकर ढेर सारा पतंग खरीद कर अपने दोस्तों में अपनी रौब जमाने लगा । और छुट्टी के दिन थे इसलिए पतंगबाज़ी कर के शाम को घर लौटा । चाचा जी कितने बार मेरे लिए पुछ चुके थे की मै आया या नहीं ।खैर जब मै घर लौटा तो यह बात भूल चूका था की चाचा जी ने मुझे पैसे किसलिए दिए थे ।थोडा -थोडा अँधेरा हो चला था तो चाचा जी घर लौटे और मुझे आवाज लगाये ,प्रेम सुबह पैसा दिये थे तुम्हे खैनी लाने को कहाँ रखे हो ।सुनकर मै तो अकबका गया की अब क्या करूँ। तभी मेरे शैतानी दिमाग में एक युक्ति आई।मै तुरंतअपने बगीचे में गया और जहां गेंदा का ढेर सारा फूल लगा हुआ था । जिसमे कुछेक पौधे सुख गए थे ,मै तुरंत अँधेरे में ही उन सूखे पत्तों को उसमे लगे जालों के साथ ही तोड़ कर खूब रगड़ रगड़ कर खैनी का आकार दे दिया ।और चाचा जी को जाकर दे दिया ।
उस समय थोडा बिजली की भी परेशानी रहती थी तो सभी जगह लालटेन ही जल रहा था । अब चाचा जी किसी भी तरह से खैनी को बनाये ,उन्हें वह स्वाद ही न आये ।और वो बार -बार मुझसे पुछे की तुम नुक्कड़ वाले पंसारी से ही खैनी लाये हो ना , मै अपनी शैतानी पे मुस्कराते हुए बोल देता जी चाचा जी ।और अपने चाचा जी को सवालों के भँवर में छोड़कर मै तो मस्ती से खाना खा कर सो गया कि अब कल क्या होगा ये कल देखेंगे ।
सुबह जब नुक्कड़ वाले पंसारी ने दुकान खोला तो चाचा जी उसके दुकान पहुँच गए ।और बोले कि कल मेरा भतीजा खैनी लेने आया था तो तुम कैसा खैनी दे दिए थे । तब दुकानदार चाचा जी का मुंह देखते हुए बोला की नहीं मालिक कल तो बबुआ साहब दुकान से खैनी नहीं ढेर सारा पतंग ले गए थे।अब चौकने की बारी मेरे चाचा जी की थी ।जब उन्होंने अपने पॉकेट से मेरे शैतानी दिमाग द्वारा बनाया हुआ खैनी पंसारी को दिखाया तो उसने मेरा राज़ खोला की ये तो गेंदे के फूल का सूखा पत्ता है। चाचा जी ने भी जब ध्यान से देखा तो उन्हें अब मेरी शैतानी साफ नज़र आ रहा था ।अब मेरे खोजाने की बारी थी ।चाचा जी जब मुझे डांटने के लिए खोज रहे थे तब तक मै अपने बचने का उपाय कर चूका था ।मैंने घर के सबसे मजबूत अदालत दादा जी के अदालत में अपनी फरियाद लगा दी थी ।कि कल किसी ने मुझे पतंग खरीदने के लिए पैसे नहीं दिए तो मै ये काम कर चूका हूँ।अब मेरे बजाये चाचा जी की डंटाने की बारी थी ।चाचा जी जब मुझे डांटने वाले थे , उसी समय दादा जी आकर चाचा जी को ही डांट लगाई कि , इतने छोटे बच्चे से खैनी मंगाया जाता है। घर में जिसने भी इस किस्से को सुने ,सभी जहाँ मेरी शैतानी पे हंसे बिना बही रह पाये, वहीँ चाचा जी को सभी ने बोला की दादा जी सही कह रहे हैं । इतने छोटे बच्चे से कहीं खैनी मंगाया जाता है ।
मै प्रेम जी का यह पतंग की दीवानगी के लिए किया हुआ यह शैतानी सुनकर खूब हंसी । पतंग की दीवानगी की और भी कई किस्से जो मै सुनी हूँ आगे आपलोगों के साथ साझा करुँगी ।
.............📝श्रीमती मुक्ता सिंह
Interesting
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