बेर और बचपन

  "बेर और बचपन"


"आजकल पेड पर लदे बेर
खुद ही मजबूरी में
नीचे गिरने लगे हैं ..

क्योंकि
बेर को भी पता है
पत्थर मारने वाला बचपन
अब मोबाईल में व्यस्त है".....

         यह उक्ति आज एक मैसेज ग्रुप में पढ़ी तो सहसा मुझे अपने बचपन की वह बात याद आ गई ।हमारे बगीचे में आम के तरह -तरह के किस्म के पेड़ ,अनार के पेड़, अमरुद के बहुत अच्छे-अच्छे किस्म के पेड़ , केला के और बेर के आठ -दस पेड़ थे।उनमे मुझे एक बेर के पेड़ का बेर बहुत अच्छा लगता था क्योंकि उसके स्वाद बिलकुल ही अलग था और एक लाल अमरुद के पेड़ का अमरुद ,जो की कच्चे फल में ही बहुत मीठा लगता था।

     मेरे पापा जी का आदेश था कि उस पेड़ के फल को सिर्फ मै खाऊँगी या जिसको मेरी मर्जी होगी उसी को दूंगी। मुझसे बिना पूछे कोई नही ले सकता था ।मै स्कूल से आते ही पहले बगीचे जाकर उन फलों को तोड़वाती और खाती, उसके बाद ही कुछ करती । एक दिन उन फलों को तोड़ने वाला कोई नहीं था, और मुझे बेर खाने का बहुत मन हो रहा था। मै सोची की आज मै ही पत्थर चला कर बेर तोड़ लेती हूँ ।और मैंने ढेर सारा छोटा -छोटा कंकड़ इकठ्ठा किया और बेर तोड़ने का प्रयास करने लगी। पर बेर तो मुझसे न टूटे क्योंकि इसके लिए अभ्यास की जरुरत होती है ।ऐसा मुझे उस दिन महशूस हुआ। बेर तो न टूटे पर बगीचे के माली का सर जरूर फुट गया ।क्योंकि जब मै बेर तोड़ने के लिए कंकड़ फेक रही थी उसी समय माली मेरे लिए बेर तोड़ने वहां जल्दी-जल्दी आ रहा था ।उसके सर से खून की धारा देख मै ही उल्टा रोने लगी।अब माली की समझ में नहीं आ रहा था की वह क्या करे।
        तभी किसी ने माँ से जाकर सारा माजरा बताया ।माँ आई तो मुझे डांट कर चुप करवाई और माली को हॉस्पिटल भेजी।शाम को जब पापा जी घर आये तो माँ ने मेरी शिकायत पापा जी से कीं। माँ बोली आज आपकी लाड़ली बेर के चक्कर में माली का सर फोड़ दी है और उल्टा खुद ही रो रही थी। पर पापा जी इन बातों को सुनकर हंसने लगे और माँ से बोले कि आपको इसकी शरारत दिख गई पर इसकी मासूमियत नहीं दिखी ।जानबूझकर तो इसने किसी का सर नहीं ना फोड़ा है। वो तो अनजाने में हो गया, पर इसकी मासूमियत देखिये की ये माली के सर से बहता हुआ खून देख कर अपनी गलती पे खुद ही रो रही थी। अब मै इसे कैसे डांट सकता हूँ। माँ गुस्सा करती हुई वहां से चली गई ।और मै उसी समय बेर अब न खाने की संकल्प ले ली । आज भी बेर देख कर मन ललच जाता है ,पर बचपन की वह बात याद कर के हाथ वहीँ रुक जाते हैं।

        बचपन भी कितना मासूम होता है सभी का। न तो कोई गम, न ईर्ष्या, न द्वेष ।कोई चीज़ पसंद हो तो पाने की युक्ति लगाना और हर हाल में पाने की चाहत।बचपन बहुत ही मासूम होता है।और अबी वही मासूमियत कहीं खोती सी जा रही है क्योंकि बच्चे बेर तोड़ने, बाहरी खेल जैसे- डोल्हा-पत्ता, कबड्डी, पीटो,लुड्डो, पतंग उड़ाने के बजाये मोबाइल में गेम खेलना, टेलीविजन में कार्टून देखना ज्यादा पसंद करने लगे है । जिससे उनका मासूम बचपन छीन रहा है।
          ........📝श्रीमती मुक्ता सिंह
    

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