पथरीली पगडंडियों पे
"पथरीली पगडंडियों पे"
ज़िन्दगी के इन पथरीली पगडंडियों पे,
मिले राह में कई राही, अपने में मग्न,
हर जगह थी बस समस्याएं खड़ी ,
हर राही था अपने में मग्न,बस अपने में मग्न।
धुप -छाँव सी खेल रही थी ,सुख-दुःख पथिक,
कर्मयोगी बढ़ रहा था बेखबर,अपने मंजिल,
राहे रोक रही थी,अंधड़-तूफान और साजिशें,
इन राहगीरों से बेख़बर ,बढ़ रहा था कर्मयोगी।
अथक परिश्रम के बाद जीत खड़ी थी मुस्कराती,
राहे बिछाए , व्याकुल नयन से ढूंढ रही थी मंजिल,
पथरीली राहे अब बनने लगी थी समतल,
क्षणभंगुर थे अंधड़-तूफान,दम तोड़ रहे थे साजिशें,
कर्मयोगी के आगे सभी समस्याएं थीं हारी,
सफलता खड़ी थी पलक पावड़े बिछाये ।
........📝श्रीमती मुक्ता सिंह
ज़िन्दगी के इन पथरीली पगडंडियों पे,
मिले राह में कई राही, अपने में मग्न,
हर जगह थी बस समस्याएं खड़ी ,
हर राही था अपने में मग्न,बस अपने में मग्न।
धुप -छाँव सी खेल रही थी ,सुख-दुःख पथिक,
कर्मयोगी बढ़ रहा था बेखबर,अपने मंजिल,
राहे रोक रही थी,अंधड़-तूफान और साजिशें,
इन राहगीरों से बेख़बर ,बढ़ रहा था कर्मयोगी।
अथक परिश्रम के बाद जीत खड़ी थी मुस्कराती,
राहे बिछाए , व्याकुल नयन से ढूंढ रही थी मंजिल,
पथरीली राहे अब बनने लगी थी समतल,
क्षणभंगुर थे अंधड़-तूफान,दम तोड़ रहे थे साजिशें,
कर्मयोगी के आगे सभी समस्याएं थीं हारी,
सफलता खड़ी थी पलक पावड़े बिछाये ।
........📝श्रीमती मुक्ता सिंह
☺👌👏✌👍
ReplyDeleteNice poem
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