पुटुस के फूल

                      "पुटुस के फूल"

             आज रास्ते में झाड़ियों के बिच छोटे-छोटे गुछों के रूप में खिले फूल को देख बचपन की यादें ताज़ा हो गई।झारखण्ड में पुटुस के फूल बहुतायत रूप से मिलते हैं ।यहाँ के लोग पुटुस की झाड़ियों को अपने खेत के चाहरदिवारी के रूप में लगाते हैं ।
और उसपे जो रंग बिरंगे फूल खिलते हैं वो बच्चों को  बहुत भाते हैं। पर शायद अब के बच्चों को न भाये।

           हमारे समय में टेलीविज़न पे इतने चैनल नहीं आते थे,न ही इतने कार्टून देखने को मिलते थे।और फ़ोन था भी तो भाया मीडिया वाला ।तो हम सभी को अपने को बिज़ी रखने के लिए आउटडोर और इनडोर गेम रियल में खेलने होते थे।चाहे वह लूडो हो सांप- सीढ़ी हो, कैरमबोर्ड ,व्यापारी , क्रिकेट, गिल्ली -डंडा, बैडमिंटन, पेंटिंग कम्पटीशन,गुलदस्ता बनाना, रंगोली बनाना ।इनके अलावे भी बहुत सारे खेल होते थे जिससे हमारा विकाश ही होता था।उसमे गुलदस्ता बनाना और रंगोली बनाने में हम पुटुस के फूल का बहुत उपयोग करते थे।
                  पुटुस का गुछों के रूप में रंग बिरंगे फूल को तोड़ने में उसके डंठल के काँटों से भी दो चार होना पड़ता था। पर सबसे अच्छा गुलदस्ता बनाने के लिए हमारे पास ढेर सारे रंगो के ढेर सारे फूल हों ,इसकी ख़ुशी के सामने बाकि सारे दर्द बेमानी होते थे ।और इसकी मीठी सी ख़ुशबू एक अलग ही आनंद देती थी मन को ।जिसका जितना ज्यादा कलर और बड़ा गुलदस्ता उसका सब बच्चों पे उतना ज्यादा मान ।

            पुटुस के फूल बहुत ही नाजुक ,मीठी खुशबु वाले और मनमोहक होते थे। ताज़े फूलों से गुलदस्ते बनते और एक दिन पहले के खिले हुए फूलों से रंगोली सजती थी ।जिसमे अपने -अपने नामों को लिख कर उसे सबसे अच्छा सजाने की अलग ललक होती थी सभी बच्चों में। एक दिन पहले के खिले पुटुस के फूल से रंगोली सजाना मजबूरी भी होती थी ,क्योंकि वह फूल टूटने के बाद बिखर जाती थी ।इसलिए उससे गुलदस्ता तो बन नहीं सकता था ,और इतनी मेहनत से तोड़े फूल को फेक भी नहीं सकते थे ।इसलिए उससे रंगोली बनाई जाती थी।
         अब तो आनेवाले दिनों में पुटुस के फूल शायद सिर्फ जंगलों में ही देखने को मिलें। क्योंकि ये आधुनिकता की बेदी पे बलि चढ़ती जा रही है ।और यदा-कदा ही रिहायसी इलाकों में देखने को मिलती है। हमारी आनेवाली पीढ़ी तो शायद इसे जाने भी ना।क्योंकि उन्हें एक तो 21वीं सदी के गैज़ेट से ही फुरसत न मिले।और अगर इंटरनेट पे खोजे भी तो शायद इसके बारे में पढ़ने को उन्हें न मिले। क्योंकि इंटरनेट पे भी इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती है।
                ..........श्रीमती मुक्ता सिंह

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