"बेटा-बेटी दोनो चिराग"

   "बेटा-बेटी दोनो चिराग"

नन्ही सी कली ने मांगी इजाज़त मुझसे,
क्या मै आऊँ धीरे से खुशियाँ बनकर ,
 मेरे आने से बसंत झूमेंगे आँगन में तेरे,
हैगी थोड़ी तुम्हे परेसानी मां तुम्हे,
ताना मारेगी दुनिया तुम्हे और मुझे।

दुनिया का न जाने ये है कैसा उसूल,
बेटों को कहते हैं घर का चिराग,
बेटियों को कहते हैं परायी अमानत,
कैसा है ये दोहरा बर्ताव ?
जबकि दोनों हैं एक दूसरे के पूरक,
एक के बिना दूजा महत्वहीन।

जाकर कोई उस मान से तो पूछो,
क्या जननी ने अलग-अलग दर्द सहा है?
ममता करती है क्या दोनों में भेद,
मां का तो दूध दोनों ने ही  पिया सामान,
 मां की आँचल में छुपे नहीं क्या दोनों समान,
फिर एक चिराग, एक परायी अमानत कैसे ?

आज हमारी बेटी दूसरे के घर जायेगी,
तो कल हम भी तो किसी की बेटी लाएंगे,
मेरी नजरों में दोनों हैं चिराग,
दोनों से होगा सभी का घर रौशन,
ईश्वर की है दोनों अनूठी रचना,
फिर दोनों में हम क्यों करें भेद।


           .......📝श्रीमती मुक्ता सिंह

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