"माँ का हक़ बेटे पे"

  "माँ का हक़ बेटे पे"


"नारी! तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास-रजत-नग पगतल में।
पीयूष-स्रोत-सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में।"

         'जयशंकर प्रसाद' जी ने 'लज्जा' के दूसरे सर्ग मे इन पंक्तियों का उल्लेख कर औरत को इन शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास किया है।
       
         आज भी एक नारी से सिर्फ इन्ही शब्दों के अनुरूप व्यव्हार की आशा की जाती है ।पर क्या उस औरत के दिल की भी बात को ये दुर्गा ,काली , मातृभूमि को भारत माता के रूप में पूजने वाले जानने का  प्रयास  करते हैं कभी ?

          एक नारी जो अपना सम्पूर्ण जीवन सिर्फ दूसरों की खुशियों के लिए बलिदान कर देती है, मायके में बेटी और बहन के रूप में । ससुराल में बहु, पत्नी और माता के रूप में ।
           मेरी एक परिचिता हैं, अभी हाल में ही उनके पति की मृत्यु एक एक्सिडेंट में हो गयी है।उसके बाद तो उनका जीवन ही बदल गया। जो अपने घर की मालकिन थी आज घर में बोझ बन गयी हैं । उनके बेटे इस 20वीं सदी में होकर भी कहते हैं की पति की मृत्यु के बाद उनको सारा सांसारिक जीवन त्याग देना चाहिए, पर घर का काम करना चाहिए ।बच्चों को तैयार करना चाहिये । कारोबार की बिकुल जानकारी नहीं लेनी चाहिए । उनके पति की मृत्यु के बाद उनके पति के पैसे कारोबार गाड़ी और सम्पति पर सिर्फ बेटों का अधिकार है ।उनको सिर्फ अपने जीवन यापन के लिए कुछ पैसे लेकर बेटों पे आश्रित होना चाहिए ।मेरे सामने की ही बात है एक दिन उन्होंने अपने बेटे से बड़ी आशा के साथ बोला की बीटा ये तुम क्या कर रहे हो क्या मेरा तुमपर अधिकार नहीं है सिर्फ बहु का ही तुमपे हक़ है ?तो उनके बेटे ने जो जवाब दिया सुनकर मेरा मन सोचने पे मजबूर हो गया की क्या एक माँ को ये बात सुननी चाहिए थी । उनके बेटे ने कहा- की मन आपका मेरे ऊपर कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि बच्चों की शादी के बाद बेटी पे दामाद का और बेटे पे बहु का हक़ हो जाता है। मन-बाप का हक़ उसी दिन खत्म हो जाता है। सुनकर मुझे एक झटका सा लगा , की क्या वही देश के बच्चे बोल रहे हैं जहाँ श्रवण कुमार ने अपने माँ -बाप को कंधे पे ढोकर तीर्थ करवाये थे। ऐसे भी कहा गया है की माँ के दूध का क़र्ज़ बच्चे सात जन्म तक नहीं उतार पाते । मेरे गुरुदेव जी ने भी हमे शिक्षा दिये हैं की अगर बच्चे 100वर्षों तक माता-पिता को एक कंधे पे ढोये और 100 वर्षों तक दूसरे कंधे पर तब भी माँ-बाप के कर्ज को नहीं चूका सकते।


            माना की बेटी तो सामाजिक बंधन से मजबूर है, इसलिए वो खुलकर माँ की देखभाल नहीं कर पाती ।क्योंकि वो भी एक औरत है और अगर भाई सक्षम हो माँ -बाप को देखने के लिए तो समाज में अपने मायके की बदनामी का भी उसे डर उसे होता है और वो खुलकर मदद नहीं कर पाती । पर क्या इसीलिए उस माँ ने रात -रात भर जग कर अपने बेटे को चैन की नींद सुलाई होंगी, थोडा सा भी चोट लगने पे हल्दी वाला दूध और दर्द का तेल बना कर कई -कई घंटे मालिश की होंगी ।अपने पति से चुपके से हॉस्टल खर्च के अलावे भी पैसे खर्च के लिए दी होंगी। क्या बेटे की शादी के बाद बेटे पे माँ का कोई हक़ नहीं रहता ?
             
                            ..........📝श्रीमती मुक्ता सिंह


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