बिंदिया

      "बिंदिया"

 सुहागन के माथे की बिंदिया,
चुपके से कह जाती है बहुत कुछ,
इसके भी है रंग कई निराले से,
पर दो नैनों के बिच लाल रंग ,
चुपके से कह जाती है बहुत कुछ।

दो नैनो के बिच सिमा रेखा हो जैसे,
दो संस्कृतियों का मिलन गान हो जैसे,
हर किसी को सबसे पहले लुभाती है ये,
दुल्हन का हर श्रृंगार है अधूरा इसके बिना,
बिन बोले कुछ कह जाती है बिंदिया ।

कभी-कभी रच जाती है चुपके से चिपकी ये,
हर किसी के दिल को छेड़ जाती है ये,
सुहागन का सोलह श्रृंगार है, इसके बिना अधूरा,
पिया के मन को मोह जाती है ये बिंदिया,
माथे के शिकन के बिच खुशियों का पैगाम है ये,
गोल परिधि सी इसकी व्यास है बड़ी।

भारतीय संस्कृति की पहचान है ये बिंदिया,
हमारे संस्कारों की जान है बिंदिया,
आज युवा अंधी दौड़ में दौड़ रहे हैं,
आधुनिकता के नाम पे पहचान खो रहे हैं,
आज बस तीज त्योहारों में ही दिखती है ये,
आधुनिक वेश के नाम पे संस्कृति खो रहे हम,
भूल गए की बिंदी है हर लड़की के मन का दर्पण।

            ...............📝श्रीमती मुक्ता सिंह

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