मेरी परछाई

   "मेरी परछाई"
मै और मेरी परछाई दोनों है एक दूसरे से मिले,
सुख-दुःख में साथ निभाती मेरी परछाई,
समय के हिसाब से है रूप बदलती,
कभी छोटी हो जाती, तो कभी लंबी हो जाती।

पर अँधेरे ने इस पर भी है आधिपत्य जमाया,
अँधेरे में मेरी परछाई भी, मेरा साथ छोड़ जाती है,
और समय की तरह अपना रूप दिखती है,
कभी छोटी,कभी बड़ी, कभी साथ छोड़ जाती है ।

एक दिन बड़े प्यार से साथ बैठी बोली परछाई,
मै हूँ तुम्हारी सच्ची हितैसी,हरवक्त साथ निभाती,
जब से तुम हो आये पृथ्वी पे ,हरवक्त हूँ साथ तेरे,
चाहे सुख हो या दुःख, हरवक्त हूँ साथ तेरे,
मै मुस्करा कर बोली झूठ न बोल मेरी हमकदम,
अँधेरा आते ही तुम साथ छोड़ जाती हो,
समय की तरह अपने रूप बदलती हो,
अब मुस्कराने की बारी थी उसकी ,
एक अदा की तरह मुस्करा कर वो बोली,
मेरे रूप बदलने के हैं कई राज ये साथी,
पर हर रूप में रहती हूँ मै साथ ही,
अंधेरों से भी मै ही लड़ कर साथ आती हूँ तेरे,
क्योंकि एक पल भी अस्तित्व नहीं मेरा बिन तेरे,
अब सोचने की थी बारी मेरी, सही तो कहा इसने।
               
                 .............📝श्रीमती मुक्ता सिंह

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