"लफ़्ज"
"लफ़्ज"
लफ़्ज वो समंदर है,
जिसकी न कोई सीमा है,
ना गहराई का अंदाज है ।
लफ्ज़ो के तीर से हुए महाभारत,
लफ्ज़ो के मायाजाल में हुआ राम वनवास,
लफ़्ज़ों के अल्फाजों में घिरा सारा संसार,
क्योंकि लफ्ज़ो के समंदर का न है कोई किनारा ।
जबां खामोश हो तो नजर को लफ़्ज दीजिये,
क्योंकि अक्सर लोग जबां नहीं नज़र पढ़ते हैं,
और लफ्जों के खामोशियों में वो असर होते हैं,
कि जब करवटे बदलते हैं तो क़हर बरसाते हैं,
इसीलिए लफ़्ज़ों को संभाल कर अल्फाज बनाइये।
क्योंकि जब लफ़्ज अल्फ़ाज बन जाते हैं तो,
तरकस से निकले बाण बन जाते हैं,
जो लाख चाहने पे भी वापिस नहीं होते हैं।
...........📝श्रीमती मुक्ता सिंह
लफ़्ज वो समंदर है,
जिसकी न कोई सीमा है,
ना गहराई का अंदाज है ।
लफ्ज़ो के तीर से हुए महाभारत,
लफ्ज़ो के मायाजाल में हुआ राम वनवास,
लफ़्ज़ों के अल्फाजों में घिरा सारा संसार,
क्योंकि लफ्ज़ो के समंदर का न है कोई किनारा ।
जबां खामोश हो तो नजर को लफ़्ज दीजिये,
क्योंकि अक्सर लोग जबां नहीं नज़र पढ़ते हैं,
और लफ्जों के खामोशियों में वो असर होते हैं,
कि जब करवटे बदलते हैं तो क़हर बरसाते हैं,
इसीलिए लफ़्ज़ों को संभाल कर अल्फाज बनाइये।
क्योंकि जब लफ़्ज अल्फ़ाज बन जाते हैं तो,
तरकस से निकले बाण बन जाते हैं,
जो लाख चाहने पे भी वापिस नहीं होते हैं।
...........📝श्रीमती मुक्ता सिंह
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