शिकवे और शिकायतें

शिकवे और शिकायतें*

जिंदगी से क्या शिकवे और शिकायतें,
सभी तो हैं बस अपने ही अपने,
इन अपनों की भीड़ में तू है मेरी जिंदगी,
सांसे भी चलती हैं तो तेरे नाम लेकर,
दिल भी धड़कता है तो बस तेरे लिए।

तुझसे क्या करूँ शिकवे और शिकायते,
अपनों के लिए ही तो है तेरे सारे आयते,
बस मै ही नहीं हूँ उन अपनों की भीड़ में,
ये जिंदगी बस इतनी सी है शिकायतें ।

मेरा वज़ूद ही टिका है तेरे नाम पे,
पर तुम तो गुम हो अपनी ही दुनिया में,
रास्तों में खड़ी हूँ तेरे इंतज्जार में,
पर सुना है आजकल तुम हवाओँ की सैर करते हो ।

जिंदगी से क्या शिकवे और शिकायतें ,
मेरी तो दुआ भी तुम और मन्नते भी तुम ही हो,
ईश्वर की दी हुई एक खूबसूरत ख्वाब भी तुम हो,
हक्कीकत भी तुम हो, और सपना भी तुम ही हो,
मेरे होने का अहशास भी तुम ही हो ।

................🙏श्रीमती मुक्ता सिंह

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