अब ना रही तुझसे कोई से शिकवे गिले

"अब ना रही तुझसे कोई से शिकवे गिले"

क्या खूब कहा है किसी ने - - -
"जाने क्या सोच के लहरे साहिल से टकराती हैं,
और फिर समंदर में लौट जाती हैं,
समझ नहीं आता कि किनारों से बेवफाई करती हैं,
या लौट कर समंदर से वफ़ा निभाती हैं।"

अब ना रही तुझसे कोई शिकवे गिले
अब तो तेरी बेवफ़ाई पे भी प्यार आता है,
तूम मेरे ना हो सके तो क्या हुआ,
मेरे दिल को तो है तेरा ही आसरा,
अब तो तेरी चाहतों से भी इश्क़ होता है,
तुम मेरे ना हुए,और तेरी चाहते तेरी ना हुई ।

अब ना रही तुझसे कोई शिकवे गिले,
जिंदगी से ज्यादा चाहा है तुम्हे,
पर तुम तो थे अमानत किसी और के,
इसे किस्मत कहूं या वक्त की बेवफ़ाई,
तुम मेरे होते हुए भी ना थे मेरे ।

अब ना रही तुझसे कोई से शिकवे गिले,
क्यूंकि तेरी ख्वाबों की मंजिलें हैं कहीं,
और हम निशा ढूंढ़ते हैं कहीं,
अपने दर्द को तो तुम सुनाते रहे,
हमारी तन्हाइयों को भी झुठलाते रहे,
हम दर्द को मुस्कराहट में छुपाते रहे ।

अब ना रही तुझसे कोई से शिकवे गिले,
इंतज़ार की घड़ियां भी अजीब होती है,
समय कटता नहीं, बेचैनी छुपती नहीं,
तुम संवर रहे हो अपनी मंजिल के लिए,
 और हम बिखर रहे हैं तेरे लिए ।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
22/8/19

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