दरका होगा तेरी बातों से"
" दरका होगा तेरी बातों से"
कितना कुछ दरका होगा तेरी बातों से,
"मां तुम तो पागल हो जाती हो,
लगता है जैसे जान से ही मार डालोगी",
मेरे दिल के टुकड़े कैसे मै दिखाऊं तुझे,
मां के दिलों में तो है बस प्यार का सागर,
जमाने की नज़रों से बचाने की बेकरारी,
ना है कोई ईर्ष्या, ना है कोई द्वेष ।
कितना कुछ दरका होगा तेरी बातों से,
माना कि इक्कसवीं सदी में हैं हम,
जहां है इंटरनेट का बोलबाला,
ना साथियों का इंतज़ार खेलने के लिए,
ना समय की है पाबंदी घर आने के लिए,
क्योंकी बच्चे घर में रहते भी हैं अकेले,
नेट ही है उनका परिवार और संसार ।
कितना कुछ दरका होगा तेरी बातों से,
क्यूंकि कैसे देखूं तुझे अपनी जिंदगी खोते,
वर्षों का तजुर्बा है, जमाने की नियतों का,
कैसे बताऊं इस डब्बे के बाहर भी है दुनिया,
इस दुनिया और उस दुनिया के कायदे है अलग,
पग पग पर है जाल बिछा कांटों का,
चादरें हैं फूलों की, और सेज सज़ा कांटों का।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
12/11/19
कितना कुछ दरका होगा तेरी बातों से,
"मां तुम तो पागल हो जाती हो,
लगता है जैसे जान से ही मार डालोगी",
मेरे दिल के टुकड़े कैसे मै दिखाऊं तुझे,
मां के दिलों में तो है बस प्यार का सागर,
जमाने की नज़रों से बचाने की बेकरारी,
ना है कोई ईर्ष्या, ना है कोई द्वेष ।
कितना कुछ दरका होगा तेरी बातों से,
माना कि इक्कसवीं सदी में हैं हम,
जहां है इंटरनेट का बोलबाला,
ना साथियों का इंतज़ार खेलने के लिए,
ना समय की है पाबंदी घर आने के लिए,
क्योंकी बच्चे घर में रहते भी हैं अकेले,
नेट ही है उनका परिवार और संसार ।
कितना कुछ दरका होगा तेरी बातों से,
क्यूंकि कैसे देखूं तुझे अपनी जिंदगी खोते,
वर्षों का तजुर्बा है, जमाने की नियतों का,
कैसे बताऊं इस डब्बे के बाहर भी है दुनिया,
इस दुनिया और उस दुनिया के कायदे है अलग,
पग पग पर है जाल बिछा कांटों का,
चादरें हैं फूलों की, और सेज सज़ा कांटों का।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
12/11/19
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