बहुत दिनों से
*बहुत दिनों से*
बहुत दिनों से कुछ छूट सा गया था,
जैसे कोई अपना रूठ गया था,
दिलों में थी मायूसी बिखरी सी,
लबों पे हंसी और आंखों में नमी सी ।
बहुत दिनों से रूठा था अहसास मेरा
जैसे कोई अपना, हो गया हो बेगाना,
आस पास सजी थी रिश्तों की महफिलें
और बेगाने से थे हम, रिश्तों कि महफिलों में।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
16/3/2020
बहुत दिनों से कुछ छूट सा गया था,
जैसे कोई अपना रूठ गया था,
दिलों में थी मायूसी बिखरी सी,
लबों पे हंसी और आंखों में नमी सी ।
बहुत दिनों से रूठा था अहसास मेरा
जैसे कोई अपना, हो गया हो बेगाना,
आस पास सजी थी रिश्तों की महफिलें
और बेगाने से थे हम, रिश्तों कि महफिलों में।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
16/3/2020
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