झूठी उम्मीदें
"झूठी उम्मीदें"
झूठी उम्मीदें, झूठी तेरी कसमें,
झूठ की नीव पे खड़ा है ये ईमारत,
मेरे प्यार को तुमने ना समझा,
और तेरे फरेब को मै मान बैठी प्यार,
क्यूं भूल जाती हूं तेरे चेहरे देख हर बात,
तू कभी भी ना था मेरा प्यार ।
समाज ने जोड़ा है हमारा रिश्ता,
दिलों में तो अभी भी कोई और है,
और कैसे चाहूं तुझे क्या की कमी है,
जब चाहा इकरार किया जब चाहा ठुकराया,
मेरी इबादतों का ये कैसा सिला दिया ।
तेरे झूठे उम्मीदों का आसरा कर लेती हूं,
तेरे झूठे अल्फाजों पे विश्वास कर लेती हूं,
हर बार उम्मीद कर दिल तोड़ लेती हूं,
थक गई मेरी मुहब्बत इम्तहान दे देकर,
दुआ देती हूं तू खुश रह अपनी दुनिया में,
मै खुश हूं तेरी खुशनुमा यादों के सहारे,
जानती हूं वो भी झूठ पे टिका है,
पर मेरे लिए तो वहीं जन्नते जहां है ।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
2/7/19
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