बचपन की होली
"बचपन की होली"
देख ये तस्वीर मन में उमड़ी वो होली,
यादें हो गई ताज़ा बचपन की होली की,
कितनी सिद्दत से इंतज़ार रहती थी हमें ,
रंग - बिरंगी रंगों से सजी इस त्योहार की,
और गर्म - गर्म मां के हाथों के मालपूए की।
फागुन आते तैयारी शुरू हो जाती थी हमारी,
वो पीतल की छोटी सी बाल्टी हमारी,
और पीतल की वो लंबी सी पिचकारी,
कितने ही रंगों के भीगे पुडिए रहते थे हम दबाए,
जैसे किसी खजाने की हो थाती हमारी,
टोली में छुप - छुप करते थे हम इंतज़ार,
बड़ों को रंगों से भिगो खुशियों से झूम जाते थे हम,
जैसे मिल गई हो खजाना सारी खुशियों की।
ना था किसी से कोई बैर, ना था किसी से द्वेष,
बस रहता था एक ही जुनून हमारा,
आज कोई भी ना छूटे हमारे इस होली के रंगों से,
लाल, गुलाबी और हरे गहरे बड़े, पीले से ना था नाता,
वो तो बस चेहरे पे मलने के काम आता ।
फिर शुरू होती हमारी रंगों से लड़ाई,
उसे छुड़ाने को हम सबमें लगती थी होड़,
क्यूंकि शाम को अबीर भी होता था खेलना,
अबीर खेल थक के सो जाते थे हम बेसुध,
आंखो में इन रंगीली यादों को संजोए,
कितनी अनोखी थी वो बचपन की हमारी होली।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
7/3/2020
देख ये तस्वीर मन में उमड़ी वो होली,
यादें हो गई ताज़ा बचपन की होली की,
कितनी सिद्दत से इंतज़ार रहती थी हमें ,
रंग - बिरंगी रंगों से सजी इस त्योहार की,
और गर्म - गर्म मां के हाथों के मालपूए की।
फागुन आते तैयारी शुरू हो जाती थी हमारी,
वो पीतल की छोटी सी बाल्टी हमारी,
और पीतल की वो लंबी सी पिचकारी,
कितने ही रंगों के भीगे पुडिए रहते थे हम दबाए,
जैसे किसी खजाने की हो थाती हमारी,
टोली में छुप - छुप करते थे हम इंतज़ार,
बड़ों को रंगों से भिगो खुशियों से झूम जाते थे हम,
जैसे मिल गई हो खजाना सारी खुशियों की।
ना था किसी से कोई बैर, ना था किसी से द्वेष,
बस रहता था एक ही जुनून हमारा,
आज कोई भी ना छूटे हमारे इस होली के रंगों से,
लाल, गुलाबी और हरे गहरे बड़े, पीले से ना था नाता,
वो तो बस चेहरे पे मलने के काम आता ।
फिर शुरू होती हमारी रंगों से लड़ाई,
उसे छुड़ाने को हम सबमें लगती थी होड़,
क्यूंकि शाम को अबीर भी होता था खेलना,
अबीर खेल थक के सो जाते थे हम बेसुध,
आंखो में इन रंगीली यादों को संजोए,
कितनी अनोखी थी वो बचपन की हमारी होली।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
7/3/2020
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