उठाओ धनुष करो संधान

"उठाओ धनुष करो संधान"

हे राम हे राम हे रघुनंदन हे श्री राम
अवतरित हो फिर से है श्री राम
धनुष ले हाथों में करो संधन
जग में बढ़ रही विपदा भारी
छूटे कुल मर्यादा, झुकी है धर्म पताका।

अवतरित हो फिर से हे श्री राम ,
फिर से उठाओ धनुष और बान,
पुकार रही तुझे ये दुखी वसुंधरा,
करो संहार दुनिया से सभी विकार का,
करो फिर से पावन अपनी वसुंधरा,
उठाओ धनुष करो संधान।

हे राम हे राम हे रघुनंदन हे श्री राम
अवतरित हो फिर से हे श्री राम
मर्यादा पुरुषोत्तम की धरती खो गई है कहीं,
अमर्यादा की है चहुं दिशा बोलबाला,
वसुंधरा हो रही लहूलुहान ।

हे राम हे राम हे रघुनंदन हे श्री राम,
अवतरित हो फिर से हे श्री राम,
उठाओ धनुष करो संधान।


श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
4/4/2020

Comments

  1. बहुत ही सराहनीय प्रेरणादायक शब्द

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