दर्द के सबब

*दर्द के सबब*

जो हमदर्द थे आज दर्द के सबब बन गए
आवाज भी ना हुई और हम कत्ल हो गए
जब तूने चाहा ,जैसे चाहा आजमाया हमे
तेरी हर कसौटियों पे हम खरे उतरते रहे।

जो हमदर्द थे आज दर्द के सबब बन गए,
तेरी राहों के कांटे चुन,फूल बन बिखरते रहे,
जो थी तेरी खुशियां, उन पे हम बिखरते रहे,
तेरी मंजिलें बदलीं, ख्वाहिशें बदलीं,
तुम जहां छोड़ गए थे हम वहीं हैं खड़े ।

जो हमदर्द थे आज दर्द के सबब बन गए,
तेरी आंखें करती हैं आज इंतज़ार किसी का,
पर हम तो इंतज़ार आज भी करते है तेरा,
तेरा ठिकाना बदला, जरूरतें बदली,
पर मेरी मजिलें तो आज भी है ठिकाना तेरा।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
11/4/2020

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