कुछ यूंही बैठे बैठे

"कुछ यूंही बैठे बैठे"

कुछ यूंही बैठे बैठे देखा अक्स अपना,
फुर्सत के पलों की दास्तां है ये क्या,
या है चिंता की लकीरों की निशानियां,
जैसे ढूंढ रही थी अपने अक्स में कुछ,
जानी - पहचानी सी छवि अपनी।

आंखों में दिखी वहीं आशाओं की चमक,
चेहरे पे थी आत्मविश्वास की दमक,
होंठों पे एक भोली सी मुस्कान खिली थी,
मैं जैसे अपनों के प्यार से दमक रही थी ।

तभी मम्मी की आवाज ने जैसे तंद्रा तोड़ा,
रात का खाने का समय हो चला था ,
मै हौले से मुस्कराई, ये कहां खो गई थी मै,
कुछ यूंही बैठे बैठे देखा अक्स अपना ।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
7/4/2020

Comments

  1. शुभकामनाएं हुक़्म कवियत्री बन गये आप
    जयजय

    ReplyDelete

Post a Comment