अनहोनी रोके कौन

अनहोनी को रोके कौन
आज फिर से चीत्कार कर उठी मानवता
उनका था क्या कसूर जिनकी छीनी इहलिला
वो आंखों में आशा लिए,तय किए थे मिलों का सफ़र
पैरों में छाले, होठों पे अपनो से मिलने की मुस्कराहट
इस क्रूर नियति की नीयत ना पहचान पाए
किस्मत से लड़ कर भी गए जीवन हार
फिर भी इस अनहोनी को ना रोक पाए।

आज उनकी आत्मा भी देख ये कराहती होगी
इस क्रूरता से कांपती होगी सहम कर यूं
और कहती होगी इस अनहोनी को रोके कौन।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
16/5/2020

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