सब कुछ कहां कह पाते हैं

*सब कुछ कहां कह पाते हैं*
जब मिली थी पहली बार नज़रे हमारी,
कुछ हलचल सी हुई थी दिल में हमारे,
तब भी हम खामोश थे, आज भी खामोश है,
फोन कर आज भी तेरी आवाज सुन लेते हैं,
फिर भी सब कुछ कहां कह पाते हैं।

रोज होते थे हम आमने-सामने,
बस एक दूसरे को देख मुस्करा देते थे,
चेहरे पढ़ नज़रों से सब कह जाते थे,
अकेले में भी ज़बान खामोश हो जाते थे ,
आज भी हम सब कुछ कहां कह पाते हैं।

आखरी वो मुलाकात आज भी याद है मुझे,
शादी का कार्ड लिए थोड़े गुस्से में थी तुम,
मै स्तब्ध सा था अपनी खामोशियों पे,
तुम मेरी खामोशियों पे खिल्ली सी उड़ाई थी,
तब भी हम सब कुछ कहां कह पाए थे।

आज भी याद है मुझे वो मनहूस दिन,
भरी आंखों से तेरी नाराज़गी झेली थी मैंने,
बोझिल क़दमों से बदहवास तेरे पीछे भागे थे,
आज भी निशान ढूंढते हैं तेरी आहटों का,
तब भी हम सब कुछ कहां कह पाते हैं ।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
12/5/2020

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