ख्वाब, जिंदगी की डांट, किस्मत

   *ख्वाब की परवरिश*

अपने ख्वाब की परवरिश करो
आज जमाना बहुत खराब है
ख्वाबों पे भी पहरे लगाती है
इसलिए ख्वाबों को पनाह दो
दिल के सात दरवाजों के भीतर ।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
18/5/2020



 *लिखते हैं मिटाते हैं*
लिखते हैं मिटाते हैं किस्मत के पन्नों पर
कई सपने बुनते हैं और धागों में उलझते हैं
कुछ ख्वाबों कि हकीकत बनाने में
कुछ मंजिलों को मिटाते हैं हम अक्सर
यूं भाग्य के क्रूर फैसलों पे हंसते हैं हम आजकल।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
18/5/2020



       *जिंदगी की डांट*
जिंदगी की डांट खा के अब संभल गए हैं हम
पथरीली पगडंडियां भी अब मंजिलें दिखाती हैं
दोस्तों की पहचान जिंदगी ने यूं कराई
कि दुश्मन भी उलझने से पहले डरते हैं आजकल।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
18/5/2020



 



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