शायद यही मंजूर

    *शायद यही मंजूर था*

आज भी तेरी याद तड़पाती है इस कदर
वो हल्का गुलाबी सा उड़ती तेरी चूनर
गुस्से भरी आंखों की वो प्यार भरी नज़र
पर हमारा बिछड़ना ही लिखा था शायद
ईश्वर को शायद यही मंजूर था ।

वो आखरी पल जब हम मिले थे यूं
जैसे दो अजनबी मिल रहे हो एक होकर
तुम जाते जाते भी शिकायत दर्ज कर गए थे
उन बड़ी बड़ी आंखों से मुझे घुरकर
और मै खुद को तसल्ली दे रहा था
किस्मत को शायद यही मंजूर था।

आज भी खैरियत ले लेता हूं खैरख्वाह बनकर,
तू ही बेखबर है मेरी मेरी इश्के-मोहब्बत से
या जानकर भी अनजान बन जाती हो
इस बात से अनजान हूं आज भी ये बेकदर
फिर सोचता हूं तुम्हे शायद यही मंजूर था।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
15/5/2020


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