तस्वीर
*तस्वीर*
आज नज़रों से ये तस्वीर गुजरी
लगा जैसे कल की ही बात हो
कल तुम मेरे पास थे जितने आज दूर हो उतने
वो लम्हा बीता दिन बीते महीने और साल बीते
हर साल आती है ये पूजा अपने नियत तिथि पे
पर वो लम्हा हुआ दुर्लभ अब इन तीन सालों में
कभी कर्तव्य बोध कभी जिम्मेवारियों का बंधन बनी दीवारें
बड़े निष्ठुर हो गए हो तुम अपनी कार्य -शीलता में
तुम क्या जानो मेरे लिए कितने मायने रखते हैं ये लम्हे
कभी तुम मेरी कोमल भावनाओं को स्पर्श तो करो
पर मै भी ढूंढ़ लेती हूं अपने मर्ज की दवा जो तुझसे जुड़ी हो
कर लिया मैंने भी ऑनलाइन तेरी पूजा
दिल को तसल्ली दी पर तेरा आशीर्वाद का वो स्पर्श ना मिला
ये इक्कीसवीं सती में कहां है वो नब्बे के दशक की अनुभूतियां
आज नज़रों से एक तस्वीर गुजरी है
और दे गई कितनी सारी यादों की सौगातें।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
25/5/2020
आज नज़रों से ये तस्वीर गुजरी
लगा जैसे कल की ही बात हो
कल तुम मेरे पास थे जितने आज दूर हो उतने
वो लम्हा बीता दिन बीते महीने और साल बीते
हर साल आती है ये पूजा अपने नियत तिथि पे
पर वो लम्हा हुआ दुर्लभ अब इन तीन सालों में
कभी कर्तव्य बोध कभी जिम्मेवारियों का बंधन बनी दीवारें
बड़े निष्ठुर हो गए हो तुम अपनी कार्य -शीलता में
तुम क्या जानो मेरे लिए कितने मायने रखते हैं ये लम्हे
कभी तुम मेरी कोमल भावनाओं को स्पर्श तो करो
पर मै भी ढूंढ़ लेती हूं अपने मर्ज की दवा जो तुझसे जुड़ी हो
कर लिया मैंने भी ऑनलाइन तेरी पूजा
दिल को तसल्ली दी पर तेरा आशीर्वाद का वो स्पर्श ना मिला
ये इक्कीसवीं सती में कहां है वो नब्बे के दशक की अनुभूतियां
आज नज़रों से एक तस्वीर गुजरी है
और दे गई कितनी सारी यादों की सौगातें।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
25/5/2020

U r best
ReplyDeleteExcellent di
ReplyDeleteयादों के गलियारे में मटरगश्ती करना काफी सुकून देता है। साथ ही यह टीस भी कि ---आता नहीं दोबारा, गुजरा हुआ जमाना।
ReplyDeleteबहरहाल, अच्छा लिखी हैं। बधाई हो ।