कुछ कोट्स (आदत से मजबूर,कुछ कहते,समझते नहीं)
*आदत से मजबूर*
मजबूरियों का ऎसा आलम है कि
ना चाहते हुए भी है तुझसे दूरियां
जानता हूं दर्द के दीवारों के उस पार हो तुम
और वक्त भी मुस्कराती है हमारी मजबूरियों पे
क्यूंकि वक्त भी अपनी आदतों से है मजबूर ।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
27/5/2020
*कुछ कहते*
हम अगर कुछ कहते हैं
तुम बेदर्द बन यूं मुस्कराते हो
पर तेरे इश्क का यूं नशा है मुझपर
कि पर्दा भी करते हैं तो
हाथों में तेरी तस्वीर लेकर।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
27/5/2020
मजबूरियों का ऎसा आलम है कि
ना चाहते हुए भी है तुझसे दूरियां
जानता हूं दर्द के दीवारों के उस पार हो तुम
और वक्त भी मुस्कराती है हमारी मजबूरियों पे
क्यूंकि वक्त भी अपनी आदतों से है मजबूर ।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
27/5/2020
*कुछ कहते*
हम अगर कुछ कहते हैं
तुम बेदर्द बन यूं मुस्कराते हो
पर तेरे इश्क का यूं नशा है मुझपर
कि पर्दा भी करते हैं तो
हाथों में तेरी तस्वीर लेकर।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
27/5/2020
*तुम समझते नहीं*
तुम समझते नहीं मेरे इस राज को
चेहरे को इस पर्दे के पीछे छिपाने का
रुख पे ये झीनी सा पर्दा ना डालूं तो
नज़र लग जाएगी मुझे तेरे इश्क़ का
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज



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