बेवजह ही

    *बेवजह ही*
बेवजह ही आशायों का दामन थामे बैठे है,
तुझसे मिलने की आरज़ू- ए- इश्क कर बैठे है,
तू कल भी थे अजनबी, आज भी वेगाने हो ।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
7/5/2020

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