राधा,रुकमणी,मीरा - कृष्ण प्रेम
आज मै अपने ब्लॉग की शुरुआत कर रही हूं प्रेम की परिभाषा से।इस ढाई अक्षर के शब्द की उत्पति भी अधूरी होती हुई भी पूरी सी है।
कृष्ण की प्रेमिकाओं में तीन नाम आते हैं।राधा, रुकमणी और मीरा।पर तीनों की व्याख्या अलग अलग है।निष्वार्थ उन्मुक्त प्रेम, दाम्पत्य के बंधन में बंधा प्रेम और उपासना से लीन बिना बंधन निश्वार्थ प्रेम।
इसको मैं थोड़े से शब्दों में व्याख्या करने का प्रयास की हूं।पर इतना जानती हूं कि प्रेम
निस्वार्थ है। अपने में ही परिपूर्ण है ।चाहे वो जिस रूप में हो। पति - पत्नी , मां बाप, भाई बन्धु, सखा भक्ति जैसे अनन्नत प्रेम ।प्रेम की ना परिभाषा है ना व्याख्या बस ये दो आत्माओं के मिलन का नाम है।
*राधा, रुकमणी,मीरा का - कृष्ण प्रेम *
प्रेम की है अनेक परिभाषा,
जिसकी जैसी भक्ति वैसा पाया
राधा ने किया कृष्ण से प्रेम येसा
बिन मोल बिक गई, ना रही वह राधा
जैसे दो आत्मा मिल बन बैठे हो एक
ना रहा भेद,ना रहा बंधन शरीर का
सारा ब्रज राधा, सारा ब्रज बने कृष्ण
गर्म दूध राधा पिए तो छाले पड़े कृष्ण को
और कृष्ण की बांसुरी भी पुकारे राधा राधा।
प्रेम तो रुकमणी ने भी किया था
किया था शुरुआत पहली प्रेम-पाती की
एक ब्राह्मण के हाथों भेजा पाती
लिखा हाल दिल का, आ मिलो प्रिय
मै प्यासी तड़प रही हूं तेरे दर्शनों की
जो आज तू ना आया, प्राण त्याग दूंगी मैं
आज तेरे नाम पे, इसी गिरिजा धाम में
रुक्मिणी की प्रेम में थी झलक पाने की
पत्नी बन अधिकार जताने की ।
प्रेम तो मीरा ने भी किया था
खो बैठी थी सुध बुद्ध अपना
ना थी पाने कि चाह उसे, ना मिटने की,
ना थी चाह कृष्णप्रिया कहलाने की
उसके तो सबकुछ थे गिरिधर गोपाल
दूजा ना था कोई उसका अपना
उसने तो की थी भक्ति कृष्ण से
कांटों की सेज पे फूल समझ सोई,
किया विषपान कृष्ण नाम का,
वो भक्त थी मुरलीवले वाले श्याम का,
भक्ति में सुध - बुध खोकर येसी हुई मगन
कि श-शरीर जा मिली प्रियतम श्री कृष्ण से।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
20/5/2020
कृष्ण की प्रेमिकाओं में तीन नाम आते हैं।राधा, रुकमणी और मीरा।पर तीनों की व्याख्या अलग अलग है।निष्वार्थ उन्मुक्त प्रेम, दाम्पत्य के बंधन में बंधा प्रेम और उपासना से लीन बिना बंधन निश्वार्थ प्रेम।
इसको मैं थोड़े से शब्दों में व्याख्या करने का प्रयास की हूं।पर इतना जानती हूं कि प्रेम
निस्वार्थ है। अपने में ही परिपूर्ण है ।चाहे वो जिस रूप में हो। पति - पत्नी , मां बाप, भाई बन्धु, सखा भक्ति जैसे अनन्नत प्रेम ।प्रेम की ना परिभाषा है ना व्याख्या बस ये दो आत्माओं के मिलन का नाम है।
*राधा, रुकमणी,मीरा का - कृष्ण प्रेम *
प्रेम की है अनेक परिभाषा,
जिसकी जैसी भक्ति वैसा पाया
राधा ने किया कृष्ण से प्रेम येसा
बिन मोल बिक गई, ना रही वह राधा
जैसे दो आत्मा मिल बन बैठे हो एक
ना रहा भेद,ना रहा बंधन शरीर का
सारा ब्रज राधा, सारा ब्रज बने कृष्ण
गर्म दूध राधा पिए तो छाले पड़े कृष्ण को
और कृष्ण की बांसुरी भी पुकारे राधा राधा।
प्रेम तो रुकमणी ने भी किया था
किया था शुरुआत पहली प्रेम-पाती की
एक ब्राह्मण के हाथों भेजा पाती
लिखा हाल दिल का, आ मिलो प्रिय
मै प्यासी तड़प रही हूं तेरे दर्शनों की
जो आज तू ना आया, प्राण त्याग दूंगी मैं
आज तेरे नाम पे, इसी गिरिजा धाम में
रुक्मिणी की प्रेम में थी झलक पाने की
पत्नी बन अधिकार जताने की ।
प्रेम तो मीरा ने भी किया था
खो बैठी थी सुध बुद्ध अपना
ना थी पाने कि चाह उसे, ना मिटने की,
ना थी चाह कृष्णप्रिया कहलाने की
उसके तो सबकुछ थे गिरिधर गोपाल
दूजा ना था कोई उसका अपना
उसने तो की थी भक्ति कृष्ण से
कांटों की सेज पे फूल समझ सोई,
किया विषपान कृष्ण नाम का,
वो भक्त थी मुरलीवले वाले श्याम का,
भक्ति में सुध - बुध खोकर येसी हुई मगन
कि श-शरीर जा मिली प्रियतम श्री कृष्ण से।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
20/5/2020


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