कब तक
*कब तक"
और कब तक तुम हाथ छोड़ जाओगे
और मै यूंही उंगलियां पकड़ पीछे आऊंगी
मन को दिलासा देती रहती हूं तेरे इंतज़ार में
और तुम बहाने बनाते हो जिम्मेवारियों का।
और कब तक चलेगी ये तन्हाइयों का आलम
तुम बेखुद-ए-बादशाह, और तुम मेरी दुआ
माना कि तुम बहुत मशरूफ हो जमानें में
पर मैं तो पलकें बिछाए बैठी हूं तेरी राहों में।
मेरी उंगलियों को छुड़ा जैसे गए थे तुम
आकर देखो आज भी खड़ी हूं उन्ही राहों में
तेरे वादों को थामें नज़रें जमाए तेरी राहों पे
और कब तक इंतजार करूं ये मेरे बादशाह
आकर फिर से साथ चलो ये मेरे खुदा।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
17/5/2020
और कब तक तुम हाथ छोड़ जाओगे
और मै यूंही उंगलियां पकड़ पीछे आऊंगी
मन को दिलासा देती रहती हूं तेरे इंतज़ार में
और तुम बहाने बनाते हो जिम्मेवारियों का।
और कब तक चलेगी ये तन्हाइयों का आलम
तुम बेखुद-ए-बादशाह, और तुम मेरी दुआ
माना कि तुम बहुत मशरूफ हो जमानें में
पर मैं तो पलकें बिछाए बैठी हूं तेरी राहों में।
मेरी उंगलियों को छुड़ा जैसे गए थे तुम
आकर देखो आज भी खड़ी हूं उन्ही राहों में
तेरे वादों को थामें नज़रें जमाए तेरी राहों पे
और कब तक इंतजार करूं ये मेरे बादशाह
आकर फिर से साथ चलो ये मेरे खुदा।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
17/5/2020

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