मां थी अजन्मे बच्चे की

    *मां थी अपने अजन्मे बच्चे की*

मानवता कहां खो गई ?
हो गए हम उस निरीह के सामने शर्मसार,
क्या गलती थी उसकी, बस भूख ?
जिसकी सजा दे दिया उसने,
पढ़ा लिखा वो जाहिल ग्वार
शास्त्रों में भी है गर्भवती अब्ध्य,
फिर क्या वो मां ना थी तेरी नज़रों में ?

इस महामारी काल में ,
मानवता दिख रहा सोशल मीडिया पर
झोली भर भर कर,
तब उस दरिंदे ने किया ये अमानवीय हरकत,
वो तो एक मां थी अपने अजन्मे बच्चे की ।

भूख से हो रही थी बेहाल
जंगलों से निकल पड़ी क्षुद्धा मिटाने को,
बड़ी आशा से किया नगर प्रवेश,
आज कुछ भी मिल जाए मेरे अजन्मे बच्चे को,
सोच याचक बन फिर रही थी द्वार द्वार
वो तो एक मां थी अपने अजन्मे बच्चे की ।

क्या कसूर था उस अनबोलती मां का,
बस इतना ही ना कि,
क्षुधा मिटाने को कर रही थी गुहार,
उस आतताई ने मानवता दिखा किया मानवता को शर्मशार,
पेट भरने को अन्नानास में दे दिया तोहफा पटाखे का,
पेट की क्षुधा मिटाने को मुंह में फोड़ती निगल गए पटाखे वो मां,
वो तो एक मां थी अपने अजन्मे बच्चे की ।

अपनी तकलीफों को झेलकर भी ,
जान बचाना चाहती थी अपने अजन्मे बच्चे की,
वो भोली अनबोलती माता क्या जानती थी,
ये अमानवीय भोजन उसे जिंदगी के बदले दे रही है मौत,
वो तो एक मां थी अपने अजन्मे बच्चे की ।

देखो कितनी हिम्मत से लड़ा फिर भी उसने ये खेल,
अपने मौत के सौदागर को माफ कर, जैसे दे रही हो श्राप मानव को,
ना उसने किसी को डराया ना किया तोड़ फोड़,
उस गहरे जल की शीतलता में जल रही थी,
और लड़ रही थी अविचल हो मौत से,
वो तो एक मां थी अपने अजन्मे बच्चे की।

शर्म करो ये वहशी दरिंदा ना आई तुम्हे ये कुकर्म करते,
कुछ तो मानवता दिखलाते ,श्राप क्यूं लगाया मानव पे ।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
4/6/2020










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