अवसाद (डिप्रेशन)
दोस्तों आज मैं आप सभी के सामने अवसाद (डिप्रेशन)पे कुछ भावों को व्यक्त कर रही हूं।क्योंकि अवसाद वो शय है जो हर किसी के जीवन मे आता है कीसी ना किसी रूप में।मैं भी एक समय मे अवसाद का स्वाद चख चुकी हूं, जब मेरे पापा जी की मृत्यु एक एक्सीडेंट में हो गयी थी।और उस समय मैं शहर में नही थी।वो मुझसे मिलने आये थे पर मै बाहर गयी हुई थी।जिस कारण उनसे मेरी अंतिम मुलाकात नही हो पाई थी।और मुझे लगता था कि काश मैं उस समय घर पे होती तो उन्हें जाने ना देती,जिससे शायद उनका काल टल जाता।हरवक्त बस उनके ही ख़यालों में खोई रहती थी ।पर धीरे धीरे अपनी माँ का दुख देखकर मैं संभलने लगी, जिसमे मेरे पतिदेव काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाय थे।मुझे अवसाद से बाहर लाने में।आज भी अकेली होती हूं तो लगता है जैसे पापा जी साथ हैं।बहुत सारे अवसरों पे उनकी कमी बहुत खलती है।🙏
"अवसाद"
अवसाद हमारे जिंदगी के सफ़र में यूं हमसफ़र बन गुजरता है,
ये हम सभी को, जीवन में कभी ना कभी हंसाता और रुलाता है ।
ये वो राही है जो दुनिया से दूर हमें नई राहों पे ले जाता है,
जिन रास्तों की ना है कोई मंजिलें,
इसके साए में हम छुप छुप कर करते हैं गुफ्तगू अपनी नाकामियों से,
और ये पहलू में बैठ मुस्कराता है ऎसे कि लगता है जिद्द किए बैठा हो नन्हा बालक जैसे,
और तन्हाइयों के आलम में आंसुओं का समंदर भी बार बार उमड़ आता है।
हम जब अपने अकेलेपन के सूनेपन को ढोते हैं जिम्मेवरियों के कंधे पर,
तब ये कभी मोहब्बत ,कभी तंगियां ,कभी नकामियां बन पनाह मांगता है,
और मेहमान बन जाता है ताउम्र,
अवसाद दिलों के अंधेरों से कर दोस्ती वेगाना बना जाता है खुशियों से,
सुना है बड़े बड़े नामचीनों से है आजकल दोस्ती इसकी,
क्यूंकि मेहनतकश तो इसे मेहनतों में भूल जाते हैं ।
अवसाद तो वो शय है जो सभी को लेता है अपने पहलुओं में कभी ना कभी।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
15/6/2020
"अवसाद"
अवसाद हमारे जिंदगी के सफ़र में यूं हमसफ़र बन गुजरता है,
ये हम सभी को, जीवन में कभी ना कभी हंसाता और रुलाता है ।
ये वो राही है जो दुनिया से दूर हमें नई राहों पे ले जाता है,
जिन रास्तों की ना है कोई मंजिलें,
इसके साए में हम छुप छुप कर करते हैं गुफ्तगू अपनी नाकामियों से,
और ये पहलू में बैठ मुस्कराता है ऎसे कि लगता है जिद्द किए बैठा हो नन्हा बालक जैसे,
और तन्हाइयों के आलम में आंसुओं का समंदर भी बार बार उमड़ आता है।
हम जब अपने अकेलेपन के सूनेपन को ढोते हैं जिम्मेवरियों के कंधे पर,
तब ये कभी मोहब्बत ,कभी तंगियां ,कभी नकामियां बन पनाह मांगता है,
और मेहमान बन जाता है ताउम्र,
अवसाद दिलों के अंधेरों से कर दोस्ती वेगाना बना जाता है खुशियों से,
सुना है बड़े बड़े नामचीनों से है आजकल दोस्ती इसकी,
क्यूंकि मेहनतकश तो इसे मेहनतों में भूल जाते हैं ।
अवसाद तो वो शय है जो सभी को लेता है अपने पहलुओं में कभी ना कभी।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
15/6/2020

Useful article!!!👍
ReplyDeleteHeart touching.. 🌹🌹🌹
ReplyDelete