जनाज़े पे अश्क के फूल चढ़ा देना
आज मैं हर ओ शख्स के लिए ये नज़्म लिख रही हूं।जो अपनी असफलताओं से मायूस हो इस दुनिया को अलविदा कह जाते हैं।और ज़माने से अपनी ज़िन्दगी से बहुत कुछ पाना चाहते हैं।पर उन्हें ठोकरें मिलती हैं।तो जाते वक्त उनकी जो मनोदशा होती है, शिकायतें होती हैं।उसको वर्णन करने का छोटा सा प्रयास है मेरा।आशा करती हूं कि आप सभी को पसंद आएगी।
और मेरी इस रचना में निराशा में जाते हुए भी एक आशा है,जो कि शीर्षक से ही पता चलता है।🙏
"जनाज़े पे अश्क के फूल चढ़ा देना'
ये ज़िन्दगी आज तेरे कूचे से यूं रुसवा होकर चले हैं हम,
कम से कम जनाजे पे दो अश्क तो बहा देना,
और थोड़ा समय मिले मशरूफियत से,
तो मेरी कब्र पे ,याद में मोहब्बत के दो फूल चढ़ा देना।
बड़ी आशाओं से दामन थामा था मैंने कामयाबियों के,
वक्त ने नज़ाकत क्या दिखाई सफलताओं ने भी मुंह मोड़ लिया जैसे,
और ज़माने के तानों ने भी छेड़ दिया है अफ़साने रुसवाइयों के।
सोचा था है बस कुछ दिनों का मेहमान तू
मौसमों की तरह एक दिन वक्त के साथ निकल जायेगा तू,
पर जमाने कि रुसवाइयों पे जैसे सवार बैठा था तू।
लो आज तेरी ही विजय हो गई मैं तो हार गया, जंग लड़ते-लड़ते,
और थककर सो गया अपनी तन्हाइयों की पहलुओं में ।
ये जिंदगी तूने जिंदा में तो ठोकरों में रखा मुझे, पर अब इल्तज़ा है इतनी, कि,
अब कम से कम मेरे तन्हाइयों के जनाजे पे दो अश्कों के फूल तो चढ़ा देना,
और मरने के बाद कब्र पे मोहब्बत के दो आंसू बहा देना।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
23/6/2020

Bahut sunder🌷🌷
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